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चौपाल: शिक्षा का दायरा

विद्यार्थियों को गूगल मीट, जूम आदि का उपयोग करके अध्ययन कराने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन भारत में छप्पन फीसदी बच्चे ऐसे है जिनकी पहुंच स्मार्टफोन तक ही नही हैं।

E-learning, Online Live Classesप्राइवेट स्कूलों को ऑनलाइन टीचिंग के लिए फीस वसूलने की अनुमति भी नहीं दी जाएगी। (Representational Image)

वैश्विक महामारी कोविड-19 के प्रकोप के कारण विश्व भर में पूर्णबंदी लगाया गया, जिसमें अब धीरे-धीरे रियायतें दी जा रही हैं। लेकिन अभी तक शिक्षण संस्थाओं को खोलने की अनुमति नहीं मिली है, जिसके चलते शिक्षण संस्थानों ने आनलाइन कक्षाओं की योजना का सहारा लिया है।

इसमें विद्यार्थियों को गूगल मीट, जूम आदि का उपयोग करके अध्ययन कराने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन भारत में छप्पन फीसदी बच्चे ऐसे है जिनकी पहुंच स्मार्टफोन तक ही नही हैं। यकीनन यह कहना गलत नहीं होगा कि इस संकट की घड़ी में और तमाम अटकलो के बीच ई-लर्निंग यानी आॅनलाइन पढ़ाई एक आवश्यक और बन कर उभरा है। लेकिन उन बच्चों के बारे में भी तो सोचना चाहिए जो आॅनलाइन पढ़ाई का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं।

एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि विभिन्न पाठशालाओं के विद्यार्थी ऐसे हैं जिनमें से सिर्फ 43.99 फीसदी बच्चों की पहुंच ही स्मार्टफोन तक है। यानी इतने बच्चों के अलावा जो भी बच्चे हैं, वे सिर्फ संसाधनों के अभाव की वजह से शिक्षा व्यवस्था से बाहर होने की कगार पर हैं। इसके अलावा, जितने बड़े पैमाने पर लोगों की रोजी-रोटी छिन गई है, लोगों की आय बेहद घट गई है, उसमें कंप्यूटर या स्मार्टफोन की खरीदारी की कल्पना संभव नहीं है।

अगर शिक्षा का रास्ता यही रहा तो आने वाले समय में देश की शैक्षिक तस्वीर कैसी बनेगी? ऐसे में ई-लर्निंग के बजाय विद्यालयों को कोई और विकल्प तलाशना चाहिए, ताकि देश का हर विद्यार्थी किसी भी हाल में शिक्षा से दूर नहीं रह पाए। शिक्षण पर हर विद्यार्थी का हक है।
’निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

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