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जनसत्ता 20 अक्तूबर, 2014: उद्धव ठाकरे ने सही कहा कि जब एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन सकता है तो मैं क्यों मुख्यमंत्री नहीं बन सकता! पर वे दिवंगत बाला साहेब ठाकरे के पुत्र हैं, न कि एक चाय वाले के, और उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति विरासत में मिली है। पता नहीं, क्यों उद्धव ठाकरे जैसे […]

जनसत्ता 20 अक्तूबर, 2014: उद्धव ठाकरे ने सही कहा कि जब एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन सकता है तो मैं क्यों मुख्यमंत्री नहीं बन सकता! पर वे दिवंगत बाला साहेब ठाकरे के पुत्र हैं, न कि एक चाय वाले के, और उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति विरासत में मिली है। पता नहीं, क्यों उद्धव ठाकरे जैसे राजनेता इस बात को स्वीकार नहीं करते कि आज की राजनीति में वे जितने भी मजबूत हैं वह अपने बल पर नहीं, बल्कि अपने पिता की विरासत के बल पर। क्या उद्धव ठाकरे यह समझते हैं कि इस तरह वे वोट हासिल कर लेंगे! नहीं, अच्छा होता कि वे राज्य के विकास की बात करते और पूर्ववर्ती सरकार से पूछते कि राज्य में विकास के लिए क्या-क्या किया गया।

 

उद्धव ठाकरे को यह मालूम होना चाहिए कि मोदी को प्रधानमंत्री जनता ने इसलिए नहीं बनाया कि वे चाय वाले के लड़के हैं, इसलिए चुना है कि उन्होंने विकास की बात की, और विकास करके दिखाया भी है। आज यही कमी है हमारी राजनीति में कि जब भी चुनाव होते हैं हम उस व्यक्ति को घेरने लगते हैं जो हमें चुनौती देने वाला लगता है या जो मजबूत दिख रहा होता है। हम अगर मुद्दों पर वोट मांगें तो लोगों के करीब पहुंचा जा सकता है।

 
’नंदराम प्रजापति, ललितपुर

 

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