Editorial: Words and actions - Jansatta
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चौपाल के अंतर्गत छपे ‘सुरक्षा के मोर्चे’ (8 दिसंबर) में शिबन कृष्ण रैणा का मत है कि जब उरी सेक्टर में गोलीबारी हो रही थी तो देश की संसद में विपक्ष साध्वी निरंजन ज्योति का इस्तीफा मांगते हुए विरोध प्रकट कर रहा था और रैणा साहब के अनुसार यह बहुत दुखद है। साहब, यह कौन-सा […]

Author December 12, 2014 1:55 PM

चौपाल के अंतर्गत छपे ‘सुरक्षा के मोर्चे’ (8 दिसंबर) में शिबन कृष्ण रैणा का मत है कि जब उरी सेक्टर में गोलीबारी हो रही थी तो देश की संसद में विपक्ष साध्वी निरंजन ज्योति का इस्तीफा मांगते हुए विरोध प्रकट कर रहा था और रैणा साहब के अनुसार यह बहुत दुखद है।

साहब, यह कौन-सा तर्क हुआ कि जब सीमा पर गोलीबारी हो रही हो तो आंतरिक मामलों को नजरअंदाज किया जाए और सरकार को खुली छूट दे दी जाए कि वह जो चाहे और जैसा चाहे करे। सीमा सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयां बहुत महत्त्वपूर्ण घटनाएं हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि आंतरिक गतिविधियां कम महत्त्वपूर्ण हैं और खासकर यह घटना जिसमें स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि देश के सत्ताधारी दल द्वारा सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश हो रही है।

साध्वी निरंजन ज्योति द्वारा दिया गया बयान इतना मामूली नहीं है कि सिर्फ माफी मांग लेने से भुला दिया जाए। ऐसे बयानों के जो दूरगामी परिणाम होते हैं, वे माफी मांग लेने से कम नहीं होते, बल्कि और बर्बर हो जाते हैं।

सरकार का यह बयान भी अपर्याप्त है कि साध्वी निरंजन ज्योति नई-नई सांसद बनी हैं और उनके पास अनुभव की कमी है। अगर वे नई हैं उनके पास अनुभव की कमी है तो सरकार की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्हें पहली बार सांसद बनने पर मंत्री बना दिया गया। दरअसल, उन्हें अपने ऐसे ही पूर्व में दिए गए बयानों के लिए मंत्री पद से पुरस्कृत किया गया है। एक मंत्री का ऐसा बयान शर्मनाक है।

 

आनंद मालवीय, इलाहाबाद

 

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