ताज़ा खबर
 

हिंदी के साथ

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: दिलीप खान ‘हिंदी की मुश्किलें’ (21 सितंबर) में लिखते हैं-‘सामाजिक विज्ञान से लेकर दूसरे अनुशासनों में अनुवादों को छोड़ दें तो हिंदी में कितना मूल-लेखन हुआ है?’ इसी में आगे वे अपनी पुरोहिताई का फतवा जारी करने से भी नहीं हिचकते हैं-‘हिंदी के लिए चिंता करने के बजाए इस भाषा को […]

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: दिलीप खान ‘हिंदी की मुश्किलें’ (21 सितंबर) में लिखते हैं-‘सामाजिक विज्ञान से लेकर दूसरे अनुशासनों में अनुवादों को छोड़ दें तो हिंदी में कितना मूल-लेखन हुआ है?’ इसी में आगे वे अपनी पुरोहिताई का फतवा जारी करने से भी नहीं हिचकते हैं-‘हिंदी के लिए चिंता करने के बजाए इस भाषा को जानने-समझने वाले लोग इसमें ज्ञान सृजन करें। यह सृजनात्मकता अगर स्थगित रही, तो बहुत मुमकिन है कि भविष्य में हिंदी का कोई भी बेहतर लेखन पाठकों को यह भरोसा दिलाने में नाकाम रहेगा कि वह सचमुच मौलिक और बौद्धिक मानदंड पर खरा उतरने वाला लेखन है। हिंदी में लद्धड़ किस्म की किताबों का इसी रफ्तार से छपना जारी रहा तो सचमुच हिंदी में इन अनुशासनों को पढ़ने से विश्वास ही उठ जाएगा।’

हिंदी में लद्धड़ लेखन है लेकिन इसे इंटरनेटी-वेबसाइट का ‘रेड ट्यूब’ कहा जाता है जो अंगरेजी में कितना विपुल और विशाल है, आप अवश्य परिचित होंगे। हिंदी में ज्ञान आधारित पर्याप्त सामग्री मौजूद है; तब भी हम वास्तविक चर्चा-विमर्श कम और विलापी-बतकुचन अधिक करते हैं। हिंदी भाषा के प्रति इस किस्म के प्रायोजित रुदन से हिंदी की मुश्किलें हल नहीं होने वाली हैं और न ही ऐसे ढपोरशंखी रवैयों से हमारे ज्ञान-आधारित विवेक-विश्वास का स्तर ऊपर उठ सकता है। आज नई पीढ़ी और नवाचारयुक्त सोच के अगुवाजन सप्रयास अपनी भाषा को तकनीकी-प्रौद्योगिकी के हर खांचे (यूनीकोडीकरण) में संजोने-सहेजने में लगे हैं; उनकी सुध लेने वाले सरकार के सटोरिए और पुरस्कार की बंदरबांट मचाने वाले कहीं दिखाई पड़ते हैं? इसलिए अंगरेजी भाषा के जानकार जो स्वयं अपनी मातृभाषा, साहित्य, ज्ञान, विज्ञान, सूचना, संस्कृति, मूल्य आदि की संचारयुक्त तकनीकी अनुप्रयोगों और उपादानों से मीलों दूर हैं; उन्हें यह कहने-सुनने का कोई अधिकार-हक नहीं बनता है कि हिंदी लेखन के नाम पर लद्धड़ लेखन हो रहा है या कि उनमें बौद्धिक स्तर का अभाव, सिद्धांतों-अवधारणाओं का लोप और सतहीपन तारी है।

भाषा में बरते जाने वाले भाव, संवेदना, संज्ञान, चिंतन, तर्क, विचार, कल्पना, स्वप्न आदि का महीन बोध और लोक-प्रत्यक्षीकरण आवश्यक है। यह काबिलियत ज्ञान-वर्चस्व अथवा बौद्धिक संपदा अधिकार की अमेरिकी-यूरोपीय प्रणाली से नहीं आ सकती है जिसके मूल में ही है कि किसी संप्रभु राष्ट्र के आत्मगौरव और आत्मसम्मान को कुचल देना, दृढ़संकल्पित भावना और कर्तव्यनिष्ठ इच्छाशक्ति रखने वाले सहज मनुष्य और उनकी मातृ-भाषाओं को विश्व-बाजार में नीलाम कर देना, मुल्क की अस्मिता, संस्कृति और विरासत को सियासी प्रभावातिरेक और नवसाम्राज्यवादी गठजोड़ द्वारा कुंठित/दमित कर देना आदि-आदि।

आज ग्रामीण परिवेश के आमजन अपने बच्चों को अंंगरेजी विद्यालयों में भेज रहे हैं; ताकि उनका बच्चा कमाने लायक कुछ सहूर सीख सके क्योंकि यह बात चहुंओर फैलाई जा रही है कि हिंदी भाषा जानने वालों के भीतर दक्षता-कौशल निर्माण की गुंजाइश न के बराबर है। उन्हें धीरे-धीरे यह भान हो चला है कि अपनी चारित्रिक निष्ठा और लोकतांत्रिक चेतना से बरी हो चुकी सरकारी मिशनरियों के मुआफिक अंंगरेजी का ज्ञान न हो, तो उन्हें अपनी आजीविका के लाले पड़ जाएंगे; अंंगरेजीदां बिरादरी उनके सोच, समझ और दृष्टि को खारिज कर देगी वगैरह-वगैरह।

यह विडंबना इतनी प्रबल है कि आज भी सरकारी/गैर-सरकारी दस्तावेज पर स्पष्ट निर्देश मिल जाएगा कि-‘अंंगरेजी का लिखा ही अंतिम रूप से सच और शुद्ध रूप से मान्य है’। अर्थात अंंगरेजी का लिखा-छपा हर शब्द और वाक्य वेद है, ब्रह्म है और उसके वाचक-प्रवंचक मठाधीश वेदांती! इस चुनौतीपूर्ण समय में हिंदी की असल मुश्किलों की खोजबीन और पड़ताल आवश्यक है, लेकिन उसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने दुराग्रह/ पूर्वग्रह की केंचुल को उतार फेंकना होगा।

राजीव रंजन प्रसाद, बीएचयू, वाराणसी

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Next Stories
1 समाज की तस्वीर
2 ठगी के खिलाफ
3 मानव-धर्म
ये पढ़ा क्या?
X