हिंदी के साथ

कांग्रेस पार्टी द्वारा नेहरू की एक सौ पचीसवीं जयंती पर आयोजित समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम में जब देश-विदेश के बड़े-बड़े महानुभाव और नेहरू-प्रेमी नेहरूजी के विचारों, खासकर उनके सेक्युलरिज्म का बढ़-चढ़ कर अंगरेजी भाषा में बखान कर रहे थे, लगभग उसी समय ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वामी विवेकानंद के ‘सपनों के […]

कांग्रेस पार्टी द्वारा नेहरू की एक सौ पचीसवीं जयंती पर आयोजित समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम में जब देश-विदेश के बड़े-बड़े महानुभाव और नेहरू-प्रेमी नेहरूजी के विचारों, खासकर उनके सेक्युलरिज्म का बढ़-चढ़ कर अंगरेजी भाषा में बखान कर रहे थे, लगभग उसी समय ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वामी विवेकानंद के ‘सपनों के भारत’ को याद करते हुए भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर अपनी चिरपरिचित शैली में हिंदी में भाषण दे रहे थे। हिंदी में दिए गए भाषण ने वहां के हजारों भारतीयों को मोदी का कायल बना दिया, यह श्रोताओं के उत्साह और उनकी उमंग से परिलक्षित हो रहा था।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले हजारों भारतीय प्रवासी एलफोंस एरीना में मोदी का भाषण सुनने के लिए सिडनी पहुंचे थे। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के अट्ठाईस साल बाद मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे, जो सिडनी आए। एक समाचार के अनुसार लगभग बीस हजार लोग स्टेडियम के अंदर थे और करीब पांच हजार लोग स्टेडियम के बाहर बड़े परदों पर मोदी का भाषण देख-सुन रहे थे। नरेंद्र मोदी के भाषण को सुनने के लिए ऑस्ट्रेलिया में ‘मोदी एक्सप्रेस’ नाम की एक ट्रेन भी चलाई गई थी। ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए एक खास ट्रेन चलाई गई हो। मोदी के सम्मान में जैसे पूरा सिडनी मोदीमय हो गया था।

अतिरिक्त प्रसन्नता की बात यह है कि इस सारी प्रक्रिया में विदेशी धरती पर हिंदी भाषा महिमा-मंडित हुई और उसके गौरव में चार चांद लग गए। इसके विपरीत हमारे देश में हम अब भी अंगरेजी से छुटकारा नहीं पा रहे हैं। विदेशी भाषा द्वारा हम विदेशियों या अंगरेजीदानों से थोड़ी देर के लिए विचारों का आदान-प्रदान तो कर सकते हैं, लेकिन अपने देश के बृहत्तर जन-समुदाय तक अपने मन और अपनी विचारधारा की बात को उतनी आत्मीयता, सहजता और स्वाभाविकता से नहीं पहुंचा सकते जितना कि अपनी भाषा द्वारा।

निज-भाषा की खूबी यही तो है कि उसकी पहुंच अपेक्षया एक विशालतर जनसमुदाय तक रहती है और सीधे-सीधे श्रोता के मन-मस्तिष्क को उद्वेलित भी करती है। कौन नहीं जानता कि हाल ही में हुए चुनावों में यह हिंदी में दिए गए भाषण ही थे जिन्होंने देश के राजनीतिक भविष्य को बदल डाला।

’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

 

 

Next Stories
1 खट्टे अंगूर
2 विरासत की सुध
3 भाजपा के रंग
यह पढ़ा क्या?
X