ताज़ा खबर
 

शिक्षा की दीवारें

गुणवत्तायुक्त उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए प्रचारित तस्वीर के बरक्स भारत के कई राज्यों में बुनियादी शिक्षा की हालत बदतर है। कथित अच्छी शिक्षा का शिगूफा बड़ी तादाद में खड़े हो गए निजी स्कूलों के तंत्र की चारदिवारी में बंद है और शिक्षा के नाम पर धन-वसूली हो रही है, मनमानी फीस ली जाती है। […]

गुणवत्तायुक्त उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए प्रचारित तस्वीर के बरक्स भारत के कई राज्यों में बुनियादी शिक्षा की हालत बदतर है। कथित अच्छी शिक्षा का शिगूफा बड़ी तादाद में खड़े हो गए निजी स्कूलों के तंत्र की चारदिवारी में बंद है और शिक्षा के नाम पर धन-वसूली हो रही है, मनमानी फीस ली जाती है। यों इन स्कूलों में प्रवेश उन्हीं बच्चों का हो पाता है, जिनकी पारिवारिक-आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। गांवों में सरकारी स्कूल बहुत कम सख्या में हैं और जो हैं भी वे बदहाली के शिकार हैं। बल्कि कई गांवों में तो स्कूल हैं भी नहीं। ऐसे में गरीब विद्यार्थियों की ढंग से पढ़ाई-लिखाई बहुत कठिन हो जाती है, क्योंकि वे निजी स्कूलों में फीस नहीं दे नहीं सकते और सरकारी स्कूल अच्छे से पढ़ाने लायक नहीं हैं।

दरअसल, निजी स्कूल बाजार में किसी दुकान तरह खुल रहे हैं। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा का बाजारीकरण गरीब विरोधी है। शिक्षा में सुधार के लिए सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती है। अगर सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ाई जाए और शिक्षकों की पूरी व्यवस्था की जाए तो विद्यार्थी सरकारी स्कूलों की तरफ का रुख करेंगे। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में केवल दाखिला बढ़ाने से कुछ ठीक नहीं होने वाला। निजी स्कूलों की चुनौती के सामने इनकी प्रगति शून्य है।

उत्तर प्रदेश में प्रारंभिक शिक्षा की हालत बहुत खराब है। राज्य में इक्यावन बच्चों पर एक शिक्षक का औसत है। जबकि इस मामले में राष्ट्रीय औसत चौंतीस विद्यार्थी का है। स्कूलों में बुनियादी संसाधनों का अभाव है। यहां बड़ी सख्या में ऐसे स्कूल भी हैं, जहां केवल एक ही शिक्षक हैं। इन स्कूलों में ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें गिनती-पहाड़ा और अपना नाम लिखने तक का ज्ञान नहीं है। देश के दूसरे हिस्सों में हालत इससे अलग नहीं है। अगर कहा जाता है कि बच्चे देश के भविष्य हैं, तो क्या यह समझना मुश्किल है कि ऐसे में देश का कैसा भविष्य तैयार होगा?

सवाल है कि शिक्षा की ऐसी बदहाली क्यों बनी हुई है। सरकारी प्राथमिक विद्यालयों स्थिति जांचने के लिए किसी शोध की जरूरत नहीं। हर जगह ब्लैकबोर्ड और शिक्षकों से विहीन सरकारी संस्थानों को देखा जा सकता है। विकास के लाख दावों के बावजूद अगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गरीबों को सुलभ नहीं है तो यह व्यवस्था किसके हित में है?

 

संजय कुमार, खोड़ा कॉलोनी, नोएडा

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

 

 

Next Stories
1 हिंदी के साथ
2 खट्टे अंगूर
3 विरासत की सुध
ये पढ़ा क्या?
X