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आतंक का दायरा

इस साल का सोलह दिसंबर विश्व इतिहास के एक सबसे शर्मनाक और दुखद दिनों में से एक माना जाएगा। बर्बरता और वहशीपन का जो चेहरा आतंकियों ने पेशावर में पेश किया, ऐसा पहले बहुत कम हुआ है। इन दहशतगर्दों के कुकृत्य के चलते न केवल मानवता शर्मसार हुई है, बल्कि आतंक के लिए प्रयोग किए […]

इस साल का सोलह दिसंबर विश्व इतिहास के एक सबसे शर्मनाक और दुखद दिनों में से एक माना जाएगा। बर्बरता और वहशीपन का जो चेहरा आतंकियों ने पेशावर में पेश किया, ऐसा पहले बहुत कम हुआ है। इन दहशतगर्दों के कुकृत्य के चलते न केवल मानवता शर्मसार हुई है, बल्कि आतंक के लिए प्रयोग किए जाने वाले तमाम शब्दों को भी खुद पर तरस आ रहा होगा। इंसान कहे जाने वाले लोगों के हृदय में यह जरूर उमड़-घुमड़ रहा होगा कि क्या ऐसे हैवान भी हम इंसानों में बीच ही पाए जाते हैं या इनकी कोई अलग दुनिया है, जहां मानवता और दया जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं है।

यह आतंक की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है कि दहशतगर्दों ने सैकड़ों बच्चों की जान ले ली! इस नृशंसता को बयान करने के लिए शायद शब्दकोश के तमाम वीभत्स शब्द कम पड़ रहे हैं। आतंकियों के धर्म होते हैं, लेकिन उनका धर्म है हैवानियत, वहशीपन, नृशंसता, अत्याचार।

सही है कि पाकिस्तान ने जो बोया, आज उसी को काटना पड़ रहा है। जिन सपोलों को पाकिस्तान ने दूध पिलाया था, आज वही सांप शेष विश्व के साथ-साथ पाकिस्तान को भी डस रहे हैं। लेकिन मासूम बच्चों की नृशंस हत्याओं को वे आतंकी खुद भी कैसे सही ठहराएंगे? जिस तरह धर्म का नाम लेकर आतंकवादी बच्चों तक का कत्लेआम मचा रहे हैं, पता नहीं अपने धर्म को वे क्या जवाब देंगे!

 

’सुधीर तेवतिया, बागपत, उप्र

 

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