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पतन का पाठ

अपने यहां शिक्षण संस्थान को पवित्रतम स्थानों में गिना जाता है। इसलिए हमने इसे विद्या का मंदिर कहना उपयुक्त समझा, पर शिक्षण संस्थानों में इधर जिस तरह की शर्मनाक घटनाएं हो रही हैं। वह हमारे नैतिक पतन को दर्शाता है। शिक्षण संस्थान में मासूमों के साथ अमानवीय कृत्य को अंजाम देने वाला कोई और नहीं, […]

अपने यहां शिक्षण संस्थान को पवित्रतम स्थानों में गिना जाता है। इसलिए हमने इसे विद्या का मंदिर कहना उपयुक्त समझा, पर शिक्षण संस्थानों में इधर जिस तरह की शर्मनाक घटनाएं हो रही हैं। वह हमारे नैतिक पतन को दर्शाता है। शिक्षण संस्थान में मासूमों के साथ अमानवीय कृत्य को अंजाम देने वाला कोई और नहीं, बल्कि वह वर्ग है जिसके कंधों पर राष्ट्र-निर्माण की जिम्मेदारी है। सवाल उठता है कि क्या हम ऐसे शिक्षकों के भरोसे विश्वगुरु बनने के सपने को हकीकत में बदल सकते हैं। अगर छह साल की मासूम बच्ची विद्या के मंदिर में सुरक्षित नहीं है तो मानना पड़ेगा कि हमारे नैतिक पतन की सीमा-रेखा समाप्त हो चुकी है।

अथर्ववेद ने शिक्षक को एक जगह ‘भूतकृत’ (मानव का निर्माता) कहा है। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय सिद्ध करते हैं कि जब पूरी दुनिया ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में मामूली जानकारी रखती थी तब हमारे शिक्षक शीर्ष पर विराजमान थे। यकीनन हमारे शिक्षकों का चरित्र उच्च कोटि का रहा है। भारत का गुरुकुल आश्रम प्लेटों के एकेडमी से प्रत्येक मायने में बेहतर था। यह जानकर आश्चर्य होता है कि दिसंबर 2012 में घटी दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म की घटना संविधान बदल देती है। लेकिन विद्या के मंदिर में मासूम के साथ पाशविक कृत्य को अंजाम देने वालों के चरित्र पर देश उद्वेलित नहीं होता!

आखिरकार देश के नीति-नियंता कब अपने शिक्षकों के उन हरकतों पर विशेष ध्यान केंद्रित करेंगे, जिससे देश का सिर शर्म से झुक जाता है। कुछ भी हो, शिक्षा के प्रांगण को और दूषित होने से बचाने के लिए हमें कठोरता के साथ आगे बढ़ना होगा। क्योंकि सभ्य समाज यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि राष्ट्र को दिशा और गति देने वाला वर्ग चरित्रहीन होकर आने वाली पीढ़ी का मार्ग दर्शन करे। पर यक्ष प्रश्न हैै कि शिक्षण संस्थानों में चरित्रहीन शिक्षकों की फौज कैसे शुमार हो गई। जब हम इसके कारणों पर ध्यान देते हैं तो तमाम अनसुलझे सवाल मुंह बाए नजर आते हैं।

दुर्भाग्य से न तो हम इन मुद्दों पर विमर्श करने की आवश्यकता समझते हैं और न ही आत्मचिंतन करने का प्रयास करते हंै। कोई भी व्यक्तिएक न्यूनतम योग्यता रखने के बाद शिक्षक बन सकता है। वैसे अगर देखा जाए तो शिक्षक प्रशिक्षण के नाम पर जो आदर्शवादी शिक्षक का परिदृश्य सामने आता है वह क्लास के पहले दिन से गायब हो जाता है। क्या इस प्रकार के व्यर्थ आदर्शवादी अध्याय से शिक्षकों का चरित्र मजबूत बनाया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान नाना प्रकार की नैतिकता सिखने के बावजूद उनके द्वारा घृणित कार्यों को अंजाम दिया जाता है।

माना कि बाजारवाद हमारे संस्कृति पर पूर्णत: हावी हो चुकी है। तो इसमें हमारा शिक्षक समुदाय कैसे विलग रह सकता है। पर क्या बाजारवाद आदर्श का ढोंग करने वाले शिक्षक को इजाजत देता है कि मनमुताबिक उगाही न होने पर छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दे। कानपुर के एक कॉलेज में आयोजित बीएड के छात्रों की प्रयोगात्मक परीक्षा इसलिए रद्द हो गई, क्योंकि अंक देने और पैसे लेने के खेल के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं हो सका। यह घटना तो मात्र उस नमूने को रेखांकित करती है, जो व्यापक स्तर पर आज हमारे शिक्षण संस्थानों और उसके रहनुमाओं की पहचान बन गई है।

स्वामी विवेकानंद अक्सर कहा करते थे कि भारत युगों से धर्मनिष्ठ देश रहा है। हमारे जीवन का संपूर्ण प्रासाद ही नैतिकता के ढांचे में मढ़ा हुआ है। उनका कहना है कि शिक्षक को पूर्ण रूप से शुद्धचित होना चाहिए तभी उसके शब्दों का मूल्य होगा। दुर्भाग्य से सरकार ने जिस अनुपात में शिक्षकों की सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी की है कहीं उससे अधिक उसके मूल्यों में गिरावट आई है।

 

धर्मेंद्र कुमार दुबे, वाराणसी

 

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