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भ्रम के साए

उमाशंकर सिंह का ‘ध्यान भटकाने का मंत्र’ (4 अक्तूबर) और ब्रजेश कानूनगो का ‘सुनो कहानी’ (4 नवंबर), ये दोनों लेख पढ़े। इन लेखों का एक ही लबोलुआब था कि लोगों का ध्यान भटकाने के लिए प्रधानमंत्री ऐसा कर रहे हैं। मैथिली में एक कहावत है ‘बाजी रहल छि त हारलौं केना’ मतलब यह कि जब […]

Author November 20, 2014 1:41 AM

उमाशंकर सिंह का ‘ध्यान भटकाने का मंत्र’ (4 अक्तूबर) और ब्रजेश कानूनगो का ‘सुनो कहानी’ (4 नवंबर), ये दोनों लेख पढ़े। इन लेखों का एक ही लबोलुआब था कि लोगों का ध्यान भटकाने के लिए प्रधानमंत्री ऐसा कर रहे हैं। मैथिली में एक कहावत है ‘बाजी रहल छि त हारलौं केना’ मतलब यह कि जब हम बोल ही रहे हैं तो हम हार कैसे गए। शायद यही बात भाजपा या कहें प्रधानमंत्री मोदी को सूझ गई है इसलिए लगातार बोलते जा रहे हैं, बोलते जा रहे हैं। दूसरी बात यह कि अभी इनका जवाब देने वालों का घोर अभाव हो गया है। इससे इनके बोल कुछ ज्यादा बढ़ गए हैं। देश में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ता फासला, रोजगार के घटते अवसर, महंगाई, भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध, पड़ोसी देशों के साथ पनप रहे नए-नए विवाद। ऐसे हालात में सत्ता में बैठे लोगों को एक ही उपाय नजर आता है कि लोगों का ध्यान भटका कर दूसरी तरफ किया जाए। सो भाजपा और नरेंद्र मोदी ऐसा कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव से अब तक भाजपा लोगों को भ्रमित कर ही यहां तक पहुंची है।

अब तक का इतिहास रहा है कि चुनाव में भाग ले रहे सभी दलों का एक घोषणा-पत्र होता था। लोगों के समक्ष यह जानने का एक मौका होता था कि कौन-सा दल युवाओं को ज्यादा से ज्यादा नौकरी दे रहा है, बुजुर्गों के पेंशन को लेकर कौन-सा दल ज्यादा संवेदनशील है। महिलाओं को अधिक सुरक्षा देने के प्रावधान किस दल में ज्यादा हैं आदि। लेकिन इस वर्ष के आम चुनाव में मुद्दे गायब थे, व्यक्ति हावी। चुनाव के बाद भी यह महिमा-गान रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

सवाल है कि हमारे चारों ओर जो भ्रमजाल फैलाया गया है उससे हम बाहर कैसे निकलेंगे। यह जरूरी नहीं कि जो हमें अच्छी बात कह रहा है, वह स्वयं भी अच्छा आचरण करता हो। अगर ऐसा होता तो किसी संत पर बलात्कार के आरोप नहीं लगते। जनता का कोई सेवक सरकारी खजाने की लूट के आरोप में न्यायालयों का चक्कर नहीं लगा रहा होता।

कई लोग मिलते हैं जो यह बताते हैं कि उन्हें राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। क्या सरकार द्वारा जो योजनाएं बनाई जा रही हैं उसे जानने-समझने की जरूरत हमें नहीं है। देश में आर्थिक, सामाजिक उतार-चढ़ाव की समीक्षा हमें नहीं करनी चाहिए? हमारे नेता पड़ोसी देशों के साथ किन-किन मुद्दों पर समझौता कर रहे हैं और यह हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण है क्या इसकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए? आज जरूरत है कि हम सब मिल कर एक परोक्ष जाल, जो हमारे ऊपर बुना जा रहा है उसे पहचानें, और लोगों को इससे आगाह करें। कहीं ऐसा न हो कि इस जाल में हम सब उलझ कर सब कुछ गंवा दें।

’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

 

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