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सफाई का सवाल

जनसत्ता 14 अक्तूबर, 2014: प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान अपने इरादों में कितना भी नेक क्यों न हो, इसे जिस रूप में चलाया जा रहा है, उसे देख कर जर्मन कवि दांते की बात याद आती है-‘ नरक का रास्ता नेक इरादों से पटा हुआ है।’ इस अभियान का पूरा जोर इस बात पर है कि […]

जनसत्ता 14 अक्तूबर, 2014: प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान अपने इरादों में कितना भी नेक क्यों न हो, इसे जिस रूप में चलाया जा रहा है, उसे देख कर जर्मन कवि दांते की बात याद आती है-‘ नरक का रास्ता नेक इरादों से पटा हुआ है।’

इस अभियान का पूरा जोर इस बात पर है कि लोगों में स्वच्छता के प्रश्न पर जागरूकता पैदा हो। सफाई के मसले पर प्रशासन की भी कोई भूमिका होती है, इसकी कहीं कोई चर्चा ही नहीं हो रही है। जबकि सचाई यही है कि सार्वजनिक स्थलों की साफ-सफाई की प्रमुख जिम्मेदारी नगर निगमों, नगर पालिकाओं, पंचायतों जैसी प्रशासनिक संस्थाओं की होती है।

सारी दुनिया में हर जगह प्रशासन के कामों में साफ-सफाई के काम को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। दुनिया के विकसित देशों में सबसे अधिक सरकारी नौकरियां नगर निगमों/ नगर पालिकाओं में ही निकला करती हैं। शहरों-गांवों को स्वच्छ रखने के लिए विस्तृत योजनाओं और सांस्थानिक ताने-बाने का निर्माण किया जाता है।

भारत के शहरों, गांवों में आज चौतरफा जिस प्रकार गंदगी दिखाई देती है, उसे दूर करने के लिए सबसे पहली जरूरत सफाई के लिए जिम्मेदार सभी संस्थाओं और विभागों के कामों की गहराई से जांच-पड़ताल करने की है। ऐसे तमाम महकमे किन कारणों से अपने काम नहीं कर पाते हैं, उन कारणों की शिनाख्त करके उन्हें दूर करना किसी भी सरकार का पहला काम होना चाहिए। लेकिन अभी जो चल रहा है, उससे तो लगता है कि सरकार की पूरी योजना इस क्षेत्र में विफलताओं का ठीकरा आम लोगों के सिर पर फोड़ने की है।

सिवाय कोरे प्रचार और दिखावे के, केंद्र सरकार ने अब तक सफाई के काम में लगी एजेंसियों के कामों में सुधार की कोई भी ठोस योजना पेश नहीं की है। देश भर की नगर पालिकाएं भ्रष्टाचार के अड्डे बनी हुई हैं। इनमें जनता के धन की खुली लूट चलती है और ये अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रही हैं। प्रधानमंत्री से लेकर किसी भी नेता, मंत्री ने इस विषय पर अब तक एक शब्द नहीं कहा है। जबकि सबसे बड़ी जरूरत इसी बात की है कि लोगों को इस स्थिति के प्रति जागरूक बनाया जाए ताकि इन सारी एजेंसियों पर उचित दबाव पैदा किए जा सके।

ऐसा न करके, साफ और स्वच्छ भारत के पूरे विषय को जनता के एक शुद्ध आत्मिक विषय में तब्दील कर देना, सारे मामले को सिर के बल खड़ा कर देना है। इस अभियान के प्रारंभ में ही इसके दुखांत की कहानी साफ दिखाई दे रही है।

अरुण माहेश्वरी, कोलकाता

 

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