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दवा से दूर

जनसत्ता 15 अक्तूबर, 2014: सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के लक्ष्य तक न पहुंच पाने का सबसे बड़ा कारण सरकारी संस्थाओं की काहिली है। अस्पतालों में दवाओं की कमी, स्वास्थ्यकर्मियों की बेरुखी आदि के किस्से आम हैं। और भी दुखद यह है कि जिन बीमारियों के महामारी का रूप ले लेने का खतरा बना रहता है उनसे […]

जनसत्ता 15 अक्तूबर, 2014: सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के लक्ष्य तक न पहुंच पाने का सबसे बड़ा कारण सरकारी संस्थाओं की काहिली है। अस्पतालों में दवाओं की कमी, स्वास्थ्यकर्मियों की बेरुखी आदि के किस्से आम हैं। और भी दुखद यह है कि जिन बीमारियों के महामारी का रूप ले लेने का खतरा बना रहता है उनसे निपटने में भी अक्षम्य लापरवाही बरती जाती है। इसका ताजा उदाहरण एचआइवी/एड्स के रोगियों को मुफ्त वितरित की जाने वाली जीवनरक्षक दवाओं का घोर अभाव है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में इन दवाओं की सबसे अधिक कमी दर्ज की गई है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूरदराज के इलाकों में क्या स्थिति होगी। बहुत-से लोग अपनी नियमित खुराक नहीं ले पा रहे हैं। बाजार से महंगी दर पर दवाएं खरीदना उनके बूते का नहीं है। इस पर उचित ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को नोटिस जारी कर रिपोर्ट तलब की है।

एचआइवी/एड्स के मामले में भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक प्रभावित देश है। इस स्थिति से उबरने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत नाको यानी राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की स्थापना की गई। यह संगठन एड्स से बचाव के लिए देश भर में जागरूकता अभियान चलाता रहा है, रोगियों की पहचान कर उन्हें मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराता है। मगर पिछले एक साल से एचआइवी/एड्स की दवाएं बनाने वाली कंपनियों ने इस संगठन को सहयोग देने से कदम पीछे खींच लिया है। वजह है उन्हें समय पर भुगतान न मिल पाना। कुछ कंपनियों ने तो इन दवाओं के लिए निविदाएं भरना ही बंद कर दिया है। अगर कंपनियों की शिकायत सही है तो मंत्रालय अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता। नाको का कहना है कि दवाओं की कमी की शिकायतें जरूर मिली हैं, मगर यह नहीं कहा जा सकता कि समस्या चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। इससे लगता है कि नाको अब भी इस मामले को हल्के ढंग से ले रहा है।

एचआइवी/एड्स के इक्कीस लाख चिह्नित रोगियों में से करीब साढ़े सात लाख पूरी तरह स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली मुफ्त दवाओं पर निर्भर हैं। मगर खबर है कि एचआइवी/एड्स प्रभावित वयस्कों की एक और बच्चों की दो दवाएं सरकारी भंडार से पूरी तरह नदारद हो चुकी हैं। इससे बहुत-से मरीजों की खुराक का चक्र टूट गया है। इस तरह उनमें एड्स के विषाणु की बढ़वार रोकने के लिए नए सिरे से प्रयास करना होगा। यह हालत एचआइवी/एड्स की दवाओं तक सीमित नहीं है।

तपेदिक, खसरा, मलेरिया आदि बीमारियों से पार पाने के मकसद से शुरू किए गए अभियानों में भी जीवनरक्षक दवाओं की अनुपलब्धता के कारण अड़चनें पैदा होती रही हैं। वैसे ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में बजटीय प्रावधान जरूरत से काफी कम है, तिस पर उसका एक खासा हिस्सा भ्रष्टाचार और बदइंतजामी की भेंट चढ़ जाता है। सरकारी दवाओं की खरीद में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। दवा निर्माताओं से मोटा कमीशन खाने और कम गुणवत्ता वाली दवाओं को भी खरीद लिए जाने के भी मामले सामने आते रहे हैं। फिर, कई बार धनाभाव के तर्क पर भुगतान को लंबे समय तक लटकाए रखा जाता है। एचआइवी/एड्स की दवाएं मुहैया न हो पाना इन सारी गड़बड़ियों का एक छोटा-सा अक्स भर है।

 

विनय रंजन, मुकर्जी नगर, नई दिल्ली

 

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