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भारतीय विद्याओं की सुध

जनसत्ता 16 अक्तूबर, 2014: पिछले पचास-पचपन वर्षों में भारतीय विद्याओं के स्तर में निरंतर ह्रास हुआ है। गुलामी के लंबे दौर के बाद देश आजाद हुआ तो आशा जगी थी अब सरकारें भारतीय विद्याओं के उद्भव और विकास के प्रति प्रतिबद्ध होकर काम करेंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। भारतीय विद्याओं में विशेषकर आयुर्वेद, ज्योतिष, वेद, […]

जनसत्ता 16 अक्तूबर, 2014: पिछले पचास-पचपन वर्षों में भारतीय विद्याओं के स्तर में निरंतर ह्रास हुआ है। गुलामी के लंबे दौर के बाद देश आजाद हुआ तो आशा जगी थी अब सरकारें भारतीय विद्याओं के उद्भव और विकास के प्रति प्रतिबद्ध होकर काम करेंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। भारतीय विद्याओं में विशेषकर आयुर्वेद, ज्योतिष, वेद, कर्मकांड, वास्तु, योग, आध्यात्मिक आदि विषयों का समावेश होता है। इन सभी विषयों के संवर्धन, संशोधन, परिवर्धन और संरक्षण का काम समाज ने एक वर्ग विशेष को दिया और तय किया कि इस वर्ग का मुख्य कार्य पठन-पाठन, अध्ययन, अध्यापन और भारतीय विद्याओं के संरक्षण का होगा और इस वर्ग की वृत्ति की व्यवस्था समाज, राज्य और श्रेष्ठि वर्ग करेगा। लेकिन समाज का यह वर्ग भारतीय विद्याओं के उन्नयन में गतिशील नहीं हो सका। धीरे-धीरे समाज में इस वर्ग के लोग अन्यान्य कार्यों में व्यस्त होते चले गए। नतीजतन, भारतीय विद्याएं निरंतर और नियमित रूप से पतन की ओर चली गर्इं।

राज्याश्रय या सेठाश्रय के चक्कर में भारतीय विद्याओं का एक नए प्रकार से दोहन शुरू हुआ। हर कोई भारतीय विद्याओं को कामधेनु समझने लगा। हर व्यक्ति अधिक से अधिक दोहन करने के चक्कर में भारतीय विद्याओं के मूल स्वरूप को नष्ट करने की राह पर चलने लगा। इस कारण समाज में भारतीय विद्याओं के नीम-हकीम पैदा होने लगे। रही-सही कसर पाश्चात्य संस्कृति और वैश्वीकरण ने पूरी कर दी। आज से सौ-पचास वर्ष पहले आयुर्वेद, ज्योतिष, कर्मकांड, योग, वेद, अध्यात्म आदि विषयों के गिने-चुने विशेषज्ञ थे और वे वाकई में विद्वान थे, मगर आज हर तरफ नए विद्वान हो गए हैं। वास्तुशास्त्र का उदाहरण लीजिए। हर वास्तुशास्त्री दूसरे वास्तुशास्त्री को गलत ठहरा देगा। आयुर्वेदीय विज्ञान का जो ज्ञान सौ-पचास वर्ष पहले था वह आज दुर्लभ हो गया है। वेदपाठी तो कष्टोपलब्ध हो गए हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में भगवान इतने हो गए हैं कि पूछिए मत।

राज्याश्रय के चलते समाज में बदलते परिवेश के कारण जिन लोगों पर भारतीय विद्याओं के संरक्षण का दायित्व था, उन्होंने नई वृत्तियों पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया। इन आर्थिक वृत्तियों के चक्कर में भारतीय विद्याएं बहुत पीछे रह गर्इं। समाज ने इसे नियति समझ कर स्वीकार कर लिया। भारतीय न्याय, ज्योतिष, वास्तु, स्वास्थ्य विज्ञान, योग, कर्मकांड, वैवाहिक पद्धति आदि सैकड़ों विषय धीरे-धीरे नष्ट होने लगे। पाश्चात्य संस्कृति के आने से भारतीय विद्याओं के स्तर में और भी ज्यादा गिरावट आ आई।

केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों को भारतीय विद्याओं के अध्ययन से कोई सरोकार नहीं है। वे तो विलायती चश्मे, विलायती भाषा और विलायती विद्याओं के दीवाने हैं। भारतीय विद्याओं के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को अलग से मंत्री नियुक्त करने चाहिए ताकि विश्व में इन विद्याओं की पताका फहरा सके। इसके साथ ही भारतीय विद्याओं के नीम हकीमों पर भी रोक लगाना आवश्यक है। भारतीय विद्याओं को किसी धर्म, पंथ या जाति से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। धर्म, अध्यात्म भारतीय विद्याओं का एक प्रकार है, संपूर्ण भारतीय विद्याएं नहीं।

उदारता, सहिष्णुता, क्षमा, करुणा और दया भारतीय विद्याओं में मूलभाव रहा है। उदारता से चिंतन कर भारतीय विद्याओं के विकास में योगदान किया जाना चाहिए। सामाजिक समरसता से ही भारतीय विद्याओं का विकास होगा। संपूर्ण भारतीय समाज आज की सामंती विचारधाराओं के अंतर्विरोध से ग्रस्त है। इस कारण भी भारतीय विद्याओं का पराभव नियमित रूप से होता रहा है। कोई विदेशी मैक्समूलर आता है और भारतीय विद्याओं का अध्ययन कर विदेशों को भारत की विराट संस्कृति से परिचित कराता है। यदि विद्याओं का चरित्र नष्ट हो जाएगा तो फिर देश, समाज, संस्कृति, आदि का क्या होगा।

यशवंत कोठारी, जयपुर

 

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