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मानव-धर्म

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: धर्म जब एक विचारधारा का रूप ले लेता है तो धीरे-धीरे उसका सांप्रदायिकीकरण हो जाता है। हिंदू, जैन, सिख, पारसी, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई आदि धर्म ऐसे ही अस्तित्व में आए हैं। इन सब धर्मों अथवा संप्रदायों के अपने सिद्धांत और अपने अनुयायी हैं। ध्यान से देखा जाए तो सभी धर्म मूलत: […]

Author September 24, 2014 1:14 PM

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: धर्म जब एक विचारधारा का रूप ले लेता है तो धीरे-धीरे उसका सांप्रदायिकीकरण हो जाता है। हिंदू, जैन, सिख, पारसी, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई आदि धर्म ऐसे ही अस्तित्व में आए हैं। इन सब धर्मों अथवा संप्रदायों के अपने सिद्धांत और अपने अनुयायी हैं। ध्यान से देखा जाए तो सभी धर्म मूलत: आत्मा के विस्तार और मानव-कल्याण की बात करते हैं। दिक्कत वहां पर खड़ी होती है जहां हम अपने धर्म को दूसरे के धर्म से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की कोशिश करते हैं।

मोटे तौर पर हमारी आत्मा की जो आवाज है, वही सच्चा धर्म है। अंतर्मन की आवाज के विपरीत यदि हम आचरण करते हैं तो वह अधर्म है। यहां मुझे अपने पितामह की एक बात याद आ रही है। मैंने कश्मीर 1962 में छोड़ा। कश्मीर विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए करने के बाद मैं पी-एचडी करने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय चला आया था। उस जमाने में कश्मीर विश्वविद्यालय में पी-एचडी करने की सुविधा नहीं थी। मेरा चयन संघ लोक सेवा आयोग (यूजीसी) की फेलोशिप के लिए हो गया था। मुझे याद है, घर से विदा होते समय दादाजी ने सर पर हाथ फेरते हुए कहा था: ‘हम से दूर जा रहे हो बेटा। हम तो तुम्हारे साथ अब होंगे नहीं। मगर एक बात का हमेशा ध्यान रखना। औरों के दुख में दुखी और औरों के सुख में सुखी होना सीखना। सच्चा मानव-धर्म यही है।’
सच्चे मानव-धर्म की इससे और सुंदर परिभाषा क्या हो सकती है!

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

 

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