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हिंदी के लिए

जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: देश को 1947 में स्वतंत्रता तो मिल गई पर स्वभाषा नहीं मिल सकी। स्वाधीनता के सारे दस्तावेज न केवल अंगरेजी में थे, बल्कि आधी रात को देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने पहला भाषण ही अंगरेजी में दिया। यही वह क्षण था जहां से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा शुरू […]

Author October 1, 2014 11:59 am

जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: देश को 1947 में स्वतंत्रता तो मिल गई पर स्वभाषा नहीं मिल सकी। स्वाधीनता के सारे दस्तावेज न केवल अंगरेजी में थे, बल्कि आधी रात को देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने पहला भाषण ही अंगरेजी में दिया। यही वह क्षण था जहां से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा शुरू हुई। हमें आजाद हुए 67 साल हो गए पर आज भी सर्वोच्च न्यायालय में बहस और फैसले हिंदी में नहीं होते। संसद के कानून, सरकार के मूल दस्तावेज, लोक सेवा आयोग के पर्चे, डॉक्टरी, इंजीनियरी, विदेश नीति आदि में हिंदी का प्रयोग नहीं किया जाता।

देश में कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य अंगरेजी के बिना नहीं हो सकता। यानी अंगरेज तो चले गए लेकिन काले अंगरेजों को अंगरेजी दे गए। पहली बार देश में ऐसा प्रधानमंत्री आया है जो विदेशों में भी जाकर हिंदी बोलता है और जिसने केंद्र सरकार के दफ्तरों में हिंदी को तवज्जो देने की बात कही है। पर तीन महीने बीत जाने के बाद भी हिंदी वहीं खड़ी है जहां पहले थी।

आमजन को चाहिए कि वह अपनी भाषा का प्रयोग हर स्तर पर, हर जगह, हर समय करे, मगर वह ऐसा करता नहीं है। भाषाएं सीखना बहुत अच्छा है। अच्छा है कि हम दो-तीन भाषाओं में पारंगत हो जाएं। अंगरेजी भी इसमें शामिल है। हम दूसरी भाषाएं सीख तो रहे हैं पर हिंदी से दूर हो रहे हैं। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि जो अंगरेजी के झंडाबरदार हैं वे कभी भी हिंदी में पारंगत होने का सुझाव नहीं देते। जब हम हिंदी के शब्दों का प्रयोग सगे-संबंधियों के लिए करते हैं तो अपने संबंधों का ठीक-ठीक वर्णन कर पाते हैं। लेकिन अंगरेजी के शब्द सब कुछ गड्डमड्ड कर देते हैं। जैसे सिस्टर इन ला- साली भी, ननंद भी। ब्रदर इन ला- साला भी, जीजा भी। और अंकल के तो कहने ही क्या! चाचा, ताऊ, फूफा, मालिक, नौकर सब अंकल। हिंदी की खूबसूरती है कि वह शब्दों से मनुष्य के मन के भाव व्यक्त करती है। इस रहस्य को समझे बिना हम हिंदी दिवस मनाते रहे हैं। जरूरत है, ठोस भाषा नीति बनाने, उसे लागू करने और अपनी भाषाओं को शिक्षा और रोजगार की भाषा बनाने की। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए। हर साल 14 सितंबर को देश में हिन्दी दिवस मनाया जाता है। जरा हम पता तो करें कि 121 करोड़ जनसंख्या के इस देश में कितने लोगों को मालूम है कि 14 सितंबर को हिंदी दिवस होता है। सरकारी कार्यालयों में भी यह वार्षिक कार्यक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। किसी अफसर, नेता या हिंदी सेवी को बुलाकर पुरस्कृत कर दिया जाता है। ऐसे कर्मकांडों के बजाय हिंदी के लिए कुछ ठोस काम किया जाना चाहिए।

आशीष कोहली ‘रौनक’, कटनी

 

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