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एकता की भाषा

हिंदी प्रचार-प्रसार संबंधी कई राष्ट्रीय संगोष्ठियों में मुझे शामिल होने का सुअवसर मिला है। इन संगोष्ठियों में अक्सर यह सवाल अहिंदी-भाषी हिंदी विद्वान करते हैं कि हम तो हिंदी सीखते हैं या फिर हमें हिंदी सीखने की सलाह दी जाती है, मगर आप लोग हमारी यानी दक्षिण भारत की एक भी भाषा सीखने के लिए […]

Author Published on: November 19, 2014 1:45 AM

हिंदी प्रचार-प्रसार संबंधी कई राष्ट्रीय संगोष्ठियों में मुझे शामिल होने का सुअवसर मिला है। इन संगोष्ठियों में अक्सर यह सवाल अहिंदी-भाषी हिंदी विद्वान करते हैं कि हम तो हिंदी सीखते हैं या फिर हमें हिंदी सीखने की सलाह दी जाती है, मगर आप लोग हमारी यानी दक्षिण भारत की एक भी भाषा सीखने के लिए तैयार नहीं हैं।

यह तर्क सुनते-सुनते मैं पक गया और आखिर एक सेमिनार में कह ही दिया कि दक्षिण की कौन-सी भाषा आप लोग हमें सीखने के लिए कह रहे हैं? तमिल, मलयालम, कन्नड़ या तेलुगू? और फिर उससे होगा क्या? आपके अहं की संतुष्टि?
पंजाबी-भाषी डोगरी सीखे तो बात समझ में आती है। राजस्थानी-भाषी गुजराती या सिंधी सीख ले तो ठीक है। इन प्रदेशों की भौगोलिक सीमाएं मिलती हैं, लिहाजा व्यापार या परस्पर व्यवहार आदि के स्तर पर इससे भाषा सीखने वालों को लाभ ही होगा।

अब आप कश्मीरी-भाषी से कहें कि वह तमिल या उडिया सीख ले या फिर पंजाबी-भाषी से कहें कि वह बांग्ला या असमिया सीख ले (क्योंकि इससे भावात्मक एकता बढ़ेगी) तो आप ही बताएं यह बेहूदा तर्क नहीं है तो क्या है? इस तर्क से अच्छा तर्क यह है कि अलग-अलग भाषाएं सीखने के बजाय सब लोग हिंदी सीख लें ताकि सब एक दूसरे से सीधे-सीधे जुड़ जाएं।

’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

 

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