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बेटियों की जगह

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ अब एक और कानून बनाने की बात चल रही है। लेकिन सच यह है कि इसके लिए पहले से मौजूद कानून ही काफी है, अगर उस पर अमल करने वाले बेईमान और निकम्मे न हों। सवाल है कि ऐसी ही स्थिति बनी रही तो कोई भी नया […]

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ अब एक और कानून बनाने की बात चल रही है। लेकिन सच यह है कि इसके लिए पहले से मौजूद कानून ही काफी है, अगर उस पर अमल करने वाले बेईमान और निकम्मे न हों। सवाल है कि ऐसी ही स्थिति बनी रही तो कोई भी नया कानून क्या बेमानी नहीं साबित होगा? कन्या भ्रूणहत्या रोकने के लिए गर्भ का पंजीकरण करवाना अनिवार्य किया जा रहा है। लेकिन पैसा कमाने के लोभी डॉक्टर और बेटे के भूखे आम लोग इसका तोड़ नहीं निकाल लेंगे? गली-कूचों में कुकुरमुत्ते की तरह फैले नर्सिंग होम में जहां धड़ल्ले से भ्रूण परीक्षण किया जाता है, वहीं बेहद असुरक्षित हालात में महिलाओं का गर्भपात भी किया जाता है। और इस तरह गर्भ में ही कन्याओं की हत्या करने की प्रथा जारी है। ऐसे में अगर कोई नया कानून आता भी है तो क्या गारंटी है कि वह असरकारी होगा ही?

आखिर बेटियों के प्रति हमारा ऐसा नजरिया क्यों है? हम सबको यह भली-भांति विचार करना होगा कि महिलाओं और पुरुषों की जनसंख्या में लिंगानुपात को सही करने के लिए सख्त कानून के साथ-साथ लोगों की मानसिकता में परिवर्तन करना आवश्यक है।

आमोद शास्त्री , मदनपुर खादर, दिल्ली

 

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