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शिक्षा का हाल

जनसत्ता 17 अक्तूबर, 2014: निर्धन छात्राओं को गुणवत्तायुक्त और तकनीकी शिक्षा देकर आत्मनिर्भर बनने के लिए ब्लाक मुख्यालयों पर कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खोले गए हैं। प्रत्येक विद्यालय में सौ छात्राओं को आवासीय सुविधा के साथ मुफ्त शिक्षा दी जाती है। जौनुपर की मडियाहूं तहसील के चार विद्यालयों में छात्राएं भूखे पेट दिन गुजार रही […]

जनसत्ता 17 अक्तूबर, 2014: निर्धन छात्राओं को गुणवत्तायुक्त और तकनीकी शिक्षा देकर आत्मनिर्भर बनने के लिए ब्लाक मुख्यालयों पर कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खोले गए हैं। प्रत्येक विद्यालय में सौ छात्राओं को आवासीय सुविधा के साथ मुफ्त शिक्षा दी जाती है। जौनुपर की मडियाहूं तहसील के चार विद्यालयों में छात्राएं भूखे पेट दिन गुजार रही थीं तो उन्हें ईद की छुट्टी के चार दिन पूर्व घर भेज दिया गया।

कारण, लेखाधिकारी के स्थानांतरण और बीएसए के निलंबन से धन की किल्लत हो गई थी। आत्मचिंतन करने वाला प्रश्न है कि क्या किसी के स्थानांतरण अथवा निलंबन की स्थिति में छात्राओं को अपने हाल पर छोड़ा जा सकता है? यह तो उन विद्यालयों की एक बानगी है जो सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजनाओं में शुमार हैं। यदि उच्चतम न्यायालय इस संदर्भ में राजनीतिक इच्छाशक्ति के घोर अभाव पर चिंता जाहिर करता है तो उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। आज कुछ शिक्षण संस्थान प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके हैं तो उसका एकमात्र कारण यह नहीं कि वहां समर्पित लोगों की फौज खड़ी है। बल्कि तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ उन्हें ऐसा बनने का उपयुक्त वातावरण मुहैया कराया जाता है। किसी डॉक्टर अथवा इंजीनियर से तो जनगणना से लगा कर पशुगणना नहीं कराई जाती। किसी बड़े सामाजिक उद्देश्य में उनकी सहभागिता अन्य वर्गों की अपेक्षा सबसे कम क्यों है।

क्या पठन-पाठन को रोक कर प्राथमिक शिक्षकों से इतर काम लेना न्यायसंगत है? हमारे नीति-नियंताओं को इस बिंदु पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि देश की तस्वीर बदली जा सके। प्राथमिक विद्यालय को भी अति-प्रतिष्ठित बनाया जा सकता है। शर्त इतनी है कि हम इसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों से कमतर अहमियत न दें।

 

धर्मेंद्र कुमार दूबे, वाराणसी

 

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