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स्वच्छता या दिखावा

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: ताजा ‘स्वच्छ भारत’ मिशन एक अच्छी पहल है। ऐसा नहीं है कि सफाई को लेकर पहली बार कोई पहल सामने आई है। अनेक बार योजनाएं बना कर काम भी किया गया है। सन 1986 में ‘केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता अभियान’ की शुरुआत की गई। 1999 में ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान’ चलाया गया और […]

Author Published on: October 4, 2014 11:06 AM

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: ताजा ‘स्वच्छ भारत’ मिशन एक अच्छी पहल है। ऐसा नहीं है कि सफाई को लेकर पहली बार कोई पहल सामने आई है। अनेक बार योजनाएं बना कर काम भी किया गया है। सन 1986 में ‘केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता अभियान’ की शुरुआत की गई। 1999 में ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान’ चलाया गया और 2012 से ‘निर्मल भारत’ अभियान जारी है। लेकिन पर्याप्त बजट और कामगारों के अभाव में योजनाएं कारगर नहीं बन पाई हैं और ऐसी पहल महज रस्म अदायगी बन कर रह जाती है। हालांकि देश के अनेक हिस्सों इस दिशा में सराहनीय काम हुए हैं। पश्चिम बंगाल के बहुत सारे गांव ‘निर्मल गांव’ और राजस्थान के अनेक गांव में ‘चोखो घर’ से चिह्नित गांव और घर आपको मिल जाएंगे। दूसरे राज्यों में भी ऐसी पहलें हुई हैं। फिर भी गांव से ज्यादा शहरों में झुग्गी-झोंपड़ी और सड़कों पर बसेरा पाने वाले लोग खुले में शौच करने के लिए अभिशप्त हैं।

देश की राजधानी में दयाबस्ती के रेलवे स्टेशन के साथ-साथ पूरे दिल्ली क्षेत्र की रेल पटरियां खुला शौचालय हैं। अगर सरकार सफाई के प्रति वाकई गंभीर है तो नेताओं को सबसे पहले इस क्षेत्र में जाकर झाड़ू पकड़नी चाहिए थी। देश की पूंजी राजधानी और ग्लैमर की नगरी मुबंई की धारावी दुनिया की सबसे बड़ी ‘स्लम’ के नाम से पहचानी जाती है। यह मुंबई शहर के क्षेत्र का केवल आठ प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन आबादी के लिहाज से यहां शहर की छप्पन फीसदी आबादी रहती है। कामकाजियों के लिए भी यह निर्यात का बड़ा केंद्र है। एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां रहने वाली आबादी के लिए एक शौचालय पर करीब साढ़े चौदह सौ निवासियों का भार है। इस नरक की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। ऐसे नरक केंद्र देश के अनेक हिस्सों में सैंकड़ों क्या, हजारों हैं। भारत की ऐसी नारकीय जीवन दशा के बारे में संयुक्त राष्ट्र की चिंताएं हर बार उसकी मानव विकास रिपोर्ट में आती रही हैं।

देश के बीमार हालात का इलाज केवल भाषण या शिगूफे से नहीं होगा। इसके लिए जीवनस्तर को ऊंचा उठाने के साथ-साथ अंधविश्वस भरे रीति-रीवाज और धार्मिक पाखंड से मुक्ति पाने की दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी, जो आज के हालात में असंभव नजर आती है। जिस विचारधारा के लोग आज देश की सत्ता में हैं, वे इस पांखड को कम करने की बजाय पाल रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद और उनके साथ अनेक हिस्सों में कहीं मंत्री या अधिकारी झाड़ू लेकर सफाई करते और कचरा उठाते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं। यह काम रोज-रोज तो होने से रहा! यह नियमित रूप से सफाई कर्मचारियों द्वारा ही किया जाना है। वास्तविकता यह है कि हमारे इतने बड़े देश में कुल सफाई कर्मचारियों की संख्या लगभग सत्ताईस लाख है। इसमें से बीस लाख ठेके के कर्मचारी बताए जाते हैं। कितने कर्मचारी काम पर हैं, कितने रिकार्ड पर हैं, यह भी एक बड़ा मामला है। जयपुर में खुद महापौर द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन में यह बात सामने आई है कि नियमित कर्मचारियों के अतिरिक्त ठेके पर चार हजार सफाई कर्मचारियों की भर्ती दर्शाया गया है। इनकी भविष्य निधि सहित वेतन राशि का भुगतान ठेकेदार को नियमित किया जा रहा है, लेकिन निरीक्षण में सामने आया कि इनमें केवल डेढ़ हजार कर्मचारी ही काम करते पाए गए। मैं जिस कॉलोनी में रहता हूं, उसकी मुख्य सड़क से ग्यारह कॉलोनियां जुड़ी हुई हैं। हमारे लगातार प्रयासों के बाद भी पिछले पंद्रह वर्षों से निगम की ओर से एक भी सफाई कर्मचारी नियुक्त नहीं हुआ है। उसके दस किलोमीटर आगे तक टोंक की तरफ जाते शहर में घनी आबादी बसी है। सबकी हालात ऐसी ही है। इन बीमार हालात के बीच लोग खुद के भरोसे ही सफाई चलाए हुए हैं। लेकिन उनकी तस्वीर कोई नहीं उतारता!

रामचंद्र शर्मा, तरूछाया नगर, जयपुर

 

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