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न्याय का तकाजा

जनसत्ता 3 अक्तूबर, 2014: भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता को चार साल के कारावास और सौ करोड़ रुपए के भारी जुर्माने के न्यायिक फैसले से देशवासियों के मन में यह संदेश अवश्य जाएगा कि हमारी न्याय व्यवस्था में ‘देर तो है, लेकिन अंधेर नहीं’। भ्रष्टाचारी चाहे कितने ही रसूखदार क्यों न हों, कभी न कभी […]

Author Published on: October 3, 2014 11:42 AM

जनसत्ता 3 अक्तूबर, 2014: भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता को चार साल के कारावास और सौ करोड़ रुपए के भारी जुर्माने के न्यायिक फैसले से देशवासियों के मन में यह संदेश अवश्य जाएगा कि हमारी न्याय व्यवस्था में ‘देर तो है, लेकिन अंधेर नहीं’। भ्रष्टाचारी चाहे कितने ही रसूखदार क्यों न हों, कभी न कभी कानून के हाथ उन तक पहुंचेंगे।

लेकिन अठारह साल पुराने मामले में आए इस फैसले से न्याय प्रणाली की लेटलतीफी भी दिखती है। ‘देरी से न्याय, न्याय नहीं है’ (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड)- यह उक्ति बिल्कुल सही है। अठारह-बीस साल का वक्त कम तो नहीं? एक पीढ़ी गुजर जाती है, अनेक मामलों में अपराधी अथवा पीड़ित (दीवानी मामलों में वादी/ प्रतिवादी) फैसला आने तक संसार को अलविदा कह चुके होते हैं। हमारी संस्था से जुड़े 1997 के दीवानी मामले में प्रतिपक्षी के वकील ने मुझसे एक दिन कहा कि फैसला आने तक मुवक्किल तो क्या हम वकील भी नहीं रहेंगे। सचमुच वैसा ही हुआ भी, 2013 में फैसला आने के समय वादी, प्रतिवादी और दोनों के पुराने वकीलों में से कोई भी जीवित नहीं रहा! न्यायपालिका के विरुद्ध बोलने की स्वतंत्रता नागरिकों को नहीं है, इसलिए न्यायपालिका को ही आत्ममंथन करके वह उपाय खोजना चाहिए जिससे तारीख पर तारीख लगने के बजाय झटपट निर्णय हो सके। भारत के लोकतंत्र में जिन बड़े सुधारों की जरूरत है उनमें यह भी एक है।

उक्त फैसले के विरोध में व्यापक पैमाने पर उग्र और हिंसक प्रदर्शन, मीडिया के लोगों के साथ मारपीट करने, कैमरे और ओबी वैन के उपकरण तोड़ने की घटनाएं, सड़कों पर रोते-बिलखते स्त्री-पुरुष, करीब पांच लोगों द्वारा आत्महत्या और ग्यारह को दिल का दौरा पड़ने जैसे वाकए चिंतित ही नहीं हैरान भी करते हैं। जयललिता की जगह नियुक्त मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम का न्यायिक निर्णय पर करुण क्रंदन और उनके शपथ ग्रहण समारोह में पसरा मातम क्या कहता है? नवनियुक्त मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि वे उस कुर्सी पर नहीं बैठेंगे जिस पर जयललिता बैठती थीं। काश! वे कहते कि भष्ट मुख्यमंत्री साबित हुर्इं अम्मा की कुर्सी पर बैठना ठीक नहीं जंच रहा है। पर नहीं! वे तो भरत की तरह अम्मा की खड़ाऊं को उनकी कुर्सी पर रख कर राजकाज चलाना चाह रहे हैं (सुना है कि जयललिता के पास हजारों जोड़ी जूते-चप्पलें हैं।

उन पर अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट को जुतियाने के आरोप भी वर्षों पहले लगे थे)! क्या नवनियुक्त मुख्यमंत्री से भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने की उम्मीद बचती है, जब वे भ्रष्ट साबित जयललिता को न्यायपालिका द्वारा दंड मिलने पर रोते-बिलखते दिखते हैं? यहां सवाल सार्वजनिक पदों, बल्कि उच्च सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के भ्रष्टाचार का है, आपसी रिश्ते-नातों का या भावनात्मक लगाव का नहीं। कम से कम तमिलनाडु की सरकार को न्यायिक निर्णय पर स्पष्ट, संतुलित और सकारात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी।
एक सवाल तमिलनाडु में आंसू बहा रहे लोगों से भी अवश्य पूछा जाना चाहिए कि वे कैसा नेता चाहते हैं? दक्षिण भारत में सिनेमा के पर्दे से राजनीति के धरातल पर उतरे सितारे लोगों की आंखों के तारे रहे हैं। रुपहले पर्दे के नायक-नायिकाओं के प्रति सम्मोहित होइए, लेकिन जब इन्हें चुन कर लोकतंत्र के मंदिर में भेजते हैं तो बेहतर यही होगा कि भावनाओं में बहने के बदले इनकी नीयत और काम को परखा जाए। सरकारों की लोकलुभावन योजनाओं के मायाजाल में फंसने के बजाय अपनी बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करें तो प्रजातांत्रिक संस्थाओं में बेहतर लोग आएंगे। जयललिता के प्रति भावनात्मक लगाव रखने वालों के दिल इसलिए टूटने चाहिए थे कि उन्होंने विश्वास करके जिसे मुख्यमंत्री बनाया उसने भ्रष्टाचार करके विश्वासघात किया। लेकिन भ्रष्टाचारी को उचित न्यायिक प्रक्रिया के बाद सजा मिलने को जो लोग अनुचित, ‘अन्याय’ मान रहे हैं उनके बारे में क्या कहें?
कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा

 

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