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भ्रम की राजनीति

गिरिराज किशोर के लेख ‘अनिवार्य मतदान से फायदा या नुकसान’ (20 नवंबर) में जिस तरह अनिवार्य मतदान के संबंध में चिंता जाहिर की गई है, उससे मेरी पूरी सहमति है। भाजपा का यह एजेंडा पुराना है। अटलजी की सरकार के दौरान भी तत्कालीन गृहमंत्री ने संविधान के पुनर्लेखन के संबंध में घोषणा की थी। तब […]
Author December 8, 2014 11:44 am

गिरिराज किशोर के लेख ‘अनिवार्य मतदान से फायदा या नुकसान’ (20 नवंबर) में जिस तरह अनिवार्य मतदान के संबंध में चिंता जाहिर की गई है, उससे मेरी पूरी सहमति है। भाजपा का यह एजेंडा पुराना है। अटलजी की सरकार के दौरान भी तत्कालीन गृहमंत्री ने संविधान के पुनर्लेखन के संबंध में घोषणा की थी। तब भी उस पर विवाद हुआ था और उसे अस्वीकार्य बताया गया था। अब जिस जादूगरी तरीके से मोदीजी राजसत्ता हासिल करने में सफल हुए हैं, उसकी पोल धीरे-धीरे खुलती जा रही है।

चाहे विदेश से कालाधन वापस लाने का मामला हो और उस धन को गरीबों के बीच बांटने का, ये सारे चुनावी बयान वैसे ही हैं कि कोई संपेरा शहर के चौक-चौराहे पर खड़े होकर लोगों को कहता है कि सांप का पैर दिखा रहा हूं। सांप का पैर देखने की उम्मीद में दर्जनों लोग घंटा भर प्रतीक्षा करते है। जब संपेरा अपनी दवा बेच कर सांपों को छोटी टोकरी में रखने लगता है तो दर्शक पूछ बैठता है कि सांप का पैर क्यों नहीं दिखाया? तो वह बेबाक होकर बोलता है कि आप नहीं जानते हैं कि सांप को पैर नहीं होता है!
उसी तरह मतदाताओं ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ के नारे के साकार होने की उम्मीद में और यूपीए सरकार की कमजोरियों, भ्रष्टाचार और भीषण महंगाई से आजिज आकर भाजपा को सत्ता में ला दिया। लेकिन ‘अच्छे दिन’ कुछ लोगों के यूपीए सरकार में भी थे और मौजूदा सरकार में भी बड़े-बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घराने के ‘अच्छे दिन’ बदस्तूर जारी हैं। सरकार के मुखिया के जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, भूटान, नेपाल यात्रा के माध्यम से केवल समस्याओं को भ्रमित करने का जाल फैलाया जा रहा है। सरकार बारीकी से सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को निजी हाथों में सौंपती जा रही है। कोल ब्लॉक का आबंटन निजी कंपनियों के हवाले कर रही है।

अब मतदान की अनिवार्यता पर जोर दिया जा रहा है। शायद इसलिए भी कि अभी पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उफान पर है। लेकिन भारत के मतदाता काली मिट्टी की तरह होते हैं। अनुकूल परिस्थिति में काली मिट्टी भीग जाने पर पैर को आसानी से नहीं छोड़ती है। लेकिन वही मिट्टी सूख जाने पर पत्थर की तरह सिर फोड़ने में भी देर नहीं करती है। अघोषित रूप से यह सरकार फासीवाद की ओर बढ़ रही है। मतदान की अनिवार्यता भी इसी ओर बढ़ते कदम हैं।

नेहरूजी ने एक बार सदन में एक प्रस्ताव पेश करते हुए कहा था कि चूंकि सदन में मुझे पूर्ण बहुमत है, इसलिए इस पर विशेष बहस की जरूरत नहीं है। इतना सुनते ही राजगोपालचारी ने कहा कि सदन में पूर्ण बहुमत आपका है, लेकिन लोकतंत्र में हमेशा किसी का बहुमत स्थायी नहीं होता है। इतना सुनते ही नेहरूजी ने सदन में उठ कर कहा कि मैं अपने वाक्य को वापस लेता हूं। सदन में उस प्रस्ताव पर बहस हुई और विपक्ष के अमूल्य सुझाव को स्वीकार कर लिया गया।

इससे मोदीजी को सबक लेने की जरूरत है। देश की जनता परेशानी, कठिनाई को स्वीकार कर सकती है, लेकिन तानाशाही को स्वीकार नहीं कर सकती है। गांधीजी का ‘स्वच्छ भारत’ मोदीजी को याद है, लेकिन उनकी धर्मनिरपेक्षता याद नहीं आती है। भारत की जनता को ज्यादा दिनों तक धोखे में नहीं रखा जा सकता है। वह झूठे वादे करने या दोहरे पैमाने रखने वालों को बहुत जल्दी पहचान जाती है और उसे सबक भी सिखाती है।

’प्रताप नारायण सिंह, बेगूसराय, बिहार

 

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