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भस्मासुर के हाथ

धर्म जो सदाचार और नैतिक बंधनों को धारण करने की शिक्षा-दीक्षा का हेतु है, सतभावी जागरूक प्रहरियों के अभाव में जड़ता और अंधता का शिकार बनता है, आज मानवता का संहारक बन चला है। किसी भी धर्म की स्थापना, उसके ध्येय और मर्म में जाए बिना उसके तथाकथित निर्देशक, फतवेबाज, उनके अनुयायी अज्ञानता और बैरभाव […]

Author December 20, 2014 6:00 AM

धर्म जो सदाचार और नैतिक बंधनों को धारण करने की शिक्षा-दीक्षा का हेतु है, सतभावी जागरूक प्रहरियों के अभाव में जड़ता और अंधता का शिकार बनता है, आज मानवता का संहारक बन चला है। किसी भी धर्म की स्थापना, उसके ध्येय और मर्म में जाए बिना उसके तथाकथित निर्देशक, फतवेबाज, उनके अनुयायी अज्ञानता और बैरभाव को परोस रहे हैं। कथित जिहादी नारे जो खून बहाने का उबाल युवा पीढ़ी में पैदा कर न केवल उन्हें आत्मघाती बना रहे हैं, बल्कि नई पीढ़ी का जीवन भी संकट में डाल रहे हैं। पाकिस्तान के सैनिक स्कूल में मानवता को शर्मसार करने वाले हमले की जितनी निंदा की जाए, कम है।

सौ से ज्यादा मासूमों का जीवन छीन लेने वाले कैसे जेहादी हैं जो चिल्ला कर कह रहे हैं कि सैनिकों को अपने बच्चों की मौत से उनके दर्द का अहसास हो जाना चाहिए। ‘मौत का बदला मौत’ का यह जिहादी भ्रम क्या कभी खत्म होगा या प्रतिक्रिया में यों ही बढ़ता रहेगा। जिहादियों की गोली के शिकार एक मासूम का अस्पताल ले जाते दिखाए गए एक टीवी साक्षात्कार में यह कहना ‘मैं अगर जिंदा बचा तो इनकी नस्लें खत्म कर दूंगा’, क्या अंतहीन सिलसिले के जारी रहने की ओर इशारा नहीं करता?

पाकिस्तान के पेशावर के सैनिक स्कूल में मासूमों का कत्लेआम हो या आस्ट्रेलिया के एक रेस्तरां में निर्दोष नागरिकों को बंधक बनाए जाने की घटना या फिर बेंगलुरु में सीरिया और इराक में फैलते ‘इस्लामी स्टेट’ की आतंकी कार्रवाइयों को इंटरनेट के जरिये आगे प्रसारित करने वाला युवक, एक ही ‘नस्ल’ के नहीं हो सकते हैं। इन सबको भ्रमित या उनके शब्दों में प्रेरित करने वाले सोच की कड़ी कहीं न कहीं एक स्रोत से जरूर जुड़ी है। अजमेर दरगाह में विस्फोट की आरोपी साध्वी, कथित लव-जिहाद के खिलाफ झंडा उठाये योगी आदित्यनाथ, आगरा से अलीगढ़ तक धर्मांतरण के कर्मकांडी, एमआइएम के औवेसी बंधु एक दूसरे को बढ़ावा देने में एक ही सोच के राही हैं।

धर्म बदलने से क्या जिंदगी बदल जाएगी? धर्म का झंडा लिए लोग धर्म का नहीं, राजनीति का काम कर रहे हैं। अफ्रीकी देशों में बोकोहराम, अरब में अल-कायदा, सीरिया और इराक में सक्रिय आइएस हो या पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान की हरकतें या भारत की राजनीति में उभरते हिंदुत्व के नारे, सब दरअसल राजसत्ता के भोग के जुगाड़ हैं। तालिबान हो या अल-कायदा, कभी अमेरिका के हाथों पले हैं, आज राजनीतिक फायदे के लिए पाले-पोसे जाने वाले ये उन्हीं के लिए भस्मासुर बन कर सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान की यह घटना भी भस्मासुरी उदाहरण है। हमारे देश में भी भिंडरावाला जिस तरह से इंदिरा गांधी के लिए भस्मासुर बना, वही स्थिति मोदी के लिए भी कथित हिंदुत्वादी ताकतें पैदा करने की ओर बढ़ रही हैं। जितनी जल्दी चेत जाएं, उसमें देश का भला है।

समाज को अज्ञानता और भ्रम में रख कर अपने राजनीतिक जुगाड़ को साधने वाले लोग कभी ज्ञान और जागृति की बात को सहन नहीं करते और इसके लिए प्रयास करने वालों को मौका मिलते ही खत्म कर देते हैं। पाकिस्तान में स्कूल पर आंतकी निशाना सैनिकों से कहीं ज्यादा शिक्षा को निशाने पर लेना था और यह मलाला को नोबेल पुरस्कार मिलने की प्रतिक्रिया भी था।

तालिबान, यानी धर्म की तालीम लेने वाले को शिक्षा लेने वालों से ये कैसा बैर! शिक्षा से आंखों पर बंधी धर्म की पट्टी के खुल जाने का ‘भय’ ही शिक्षा के लिए अलख जगाने में जुटी मलाला पर गोली दागता है और वही ‘सोच’ सैनिक स्कूल के मासूमों का लहू बहाता है। ये तालिबानी इससे पहले पाकिस्तान में एक हजार से अधिक स्कूल तबाह कर चुके हैं। ये भूतकामी सोच के सहारे भविष्य को कुचलने के पंथी नारे अरब में उठ रहे हों या पाक-अफगान या भारत से, मानवता और वैज्ञानिक सोच के दुश्मन हैं। नोबेल पुरस्कार लेते हुए मलाला ने इन्हीं तालिबानियों की ओर इशारा करते हुए ठीक ही कहा था कि ‘बच्चों के हाथों में किताब के बदले बंदूक पकड़ाना और स्कूल बनाने के बदले टैंक बनाना इनके लिए आसान है। चाहे जो परेशानियां आएं, पढ़ने और पढ़ाने के हमारे इरादे नहीं बदल सकते।’ यही हौसला सैनिक स्कूल के विद्यार्थियों में भी दिखा।

 

रामचंद्र शर्मा, तरूछाया नगर, जयपुर

 

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