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आतंक का सिरा

पिछले दिनों उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के पेशावर शहर में सेना द्वारा संचालित एक स्कूल में भारी हथियारों से लैस अरबी-भाषी तालिबानी आत्मघाती हमलावरों ने स्कूल में पढ़ रहे मासूम और बेगुनाह बच्चों पर अंधाधुंध गोलियां बरसार्इं और एक सौ इकतीस बच्चों सहित करीब डेढ़ सौ लोगों को मार डाला। हमारे देश सहित विश्व-भर के लगभग सभी […]

Author December 20, 2014 1:13 PM

पिछले दिनों उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के पेशावर शहर में सेना द्वारा संचालित एक स्कूल में भारी हथियारों से लैस अरबी-भाषी तालिबानी आत्मघाती हमलावरों ने स्कूल में पढ़ रहे मासूम और बेगुनाह बच्चों पर अंधाधुंध गोलियां बरसार्इं और एक सौ इकतीस बच्चों सहित करीब डेढ़ सौ लोगों को मार डाला। हमारे देश सहित विश्व-भर के लगभग सभी देशों ने आतंकियों द्वारा किए गए इस अमानवीय कृत्य या नरसंहार की कड़े शब्दों में निंदा की है और आतंकी गतिविधियों का खात्मा करने के लिए विश्व-समुदाय से एकजुट होने की अपील की है।

अगरचे यह अवसर आतंकवाद के कारणों या उसके ‘उद्भव-विकास’ की समीक्षा करने का नहीं है, फिर भी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अहमद करजई के उस वक्तव्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता जिसमें उन्होंने अपने एक भाषण के दौरान कहा था- ‘आतंकवादी संगठन अपराधियों, हत्यारों और गुनाहगारों की वह जमात है, जिसे पिछली कई सरकारों ने बदकिस्मती से अपने राजनीतिक मतलब के लिए प्रश्रय दिया है और अब वे अपनी जगह पर मजबूती से खड़े हैं।’

एक बात यह समझ में नहीं आती है कि ये खूंखार भेड़िये मरने-मारने के लिए हथियार कहां से लाते हैं? कौन इनकी आर्थिक और सामरिक मदद करता है? किसके कहने या निर्देश पर ये दरिंदे जान लेते और देते हैं?
कोई तो है जो परदे के पीछे इनकी पीठ थपथपा रहा है! यह सब कुछ पता लगाने की जरूरत है। एक बार हथियार लाने-ले जाने के मार्गों का पता लग जाए और इन रास्तों की सख्ती से नाकेबंदी हो जाए तो निश्चित रूप से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। कौन नहीं जानता कि दरअसल यह बंदूक और गोली है, जिससे आतंकवाद परवान चढ़ा है। विश्व में हथियारों के ‘अवैध’ कारोबार पर जिस दिन विराम लग जाएगा, सच मानिए, आतंकवाद भी थम जायगा!

’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर, राजस्थान

 

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