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सहिष्णुता की सीमा

आए दिन जब धर्म से जुड़ी हिंसा या असहिष्णु व्यवहार से संबंधित खबरें पढ़ती हूं तो मन दहल जाता है। भारत एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता और सहिष्णुता को कानून और समाज..

Author नई दिल्ली | November 2, 2015 9:41 PM
दादर के बिसहाड़ा गांव में कथित तौर पर गौमांस खाने की अफवाह फैलने के बाद उपद्रवी भीड़ ने अखलाक नाम के एक मुस्लिम युवक की हत्या कर दी थी। (बिसहाड़ा गांव की तस्वीर)

आए दिन जब धर्म से जुड़ी हिंसा या असहिष्णु व्यवहार से संबंधित खबरें पढ़ती हूं तो मन दहल जाता है। भारत एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता और सहिष्णुता को कानून और समाज दोनों के बीच मान्यता प्राप्त है। हमारे अतीत में भी धर्म का संस्कृति में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत विश्व की चार प्रमुख धार्मिक परंपराओं का जन्मस्थान है- हिंदू, बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म। यहां का एक विशाल बहुमत खुद को किसी न किसी धर्म से संबंधित अवश्य बताता है। लेकिन आज धर्म को मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर और गुरद्वारे में समेट कर देखा जाता है।

कभी अखबार में दादरी कांड से जुड़ी खबर मिलती है तो कभी मोगा जिले के गांव बुटर कला में गुरुग्रंथ साहिब के फटे पन्नों से उपजे विवाद की खबर। दुख होता है कि जिस भारत को विविधताओं का देश कहा जाता रहा है, वहां लोग धर्म के नाम पर आपस में एक दूसरे की जान पर उतारू हो जाते हैं। कभी अखलाक को मात्र शक के आधार पर मारा डाला जाता हैं तो कभी पुलिसकर्मियों पर जम कर पथराव होता है।

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जबकि धर्म का सामान्य-सा अर्थ है कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचार, सद्गुण। धर्म वह है जो अपने अनुकूल न लगे वैसा व्यवहार दूसरों से नहीं करने की सीख देता है। भारत के लोग धर्म को मात्र अपने मजहब से जोड़ कर देखते हैं। किसी की हत्या मात्र इस बात पर कर देना कि उसके यहां गाय का मांस होने का शक है या उसने किसी धार्मिक ग्रंथ के पन्ने फाड़े हैं, क्या ऐसी बातों को धर्म का नाम देना या विवाद बनाना उचित है? क्या इंसान के पास यह अधिकार है कि मजहब के नाम पर वह किसी के प्राण ले ले? अगर धर्म का यही स्वरूप रहा नास्तिक लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी। यों भी, इंसान ने धर्म बनाया है, धर्म ने इंसान को नहीं। (श्वेतलाना, मिरांडा हाउस, दिल्ली)

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हाशिये पर शिक्षा

पिछले दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उन विद्यार्थियों की फेलोशिप बंद करने की घोषणा कर दी जो बगैर नेट क्वालिफाई किए देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एमफिल या पीएचडी कर रहे हैं। गौरतलब है कि वर्तमान में प्राध्यापक और सहायक प्राध्यापक की न्यूनतम योग्यता नेट कर दी गई है। फिर भी अनेक ऐसे विद्यार्थी हैं जो विश्वविद्यालय में एमफिल या पीएचडी में दाखिला लेकर शोध कार्य कर रहे हैं। मगर यूजीसी का यह निर्णय उन विद्यार्थियों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह सहायता राशि उनके शोध को निरंतर बनाए रखने में मदद करती थी। पिछले कुछ समय से विद्यार्थियों की सहायता राशि दोगुनी करने की मांग चल रही थी। लेकिन इसके बजाय इसे बंद करने का ही निर्णय ले लिया गया, बिना कोई वाजिब कारण बताए। आयोग की तरफ से सिर्फ इतना कहा गया कि इस तरह की फेलोशिप में निरंतर गड़बड़ियां देखने को मिली हैं।

उच्च शिक्षा के संबंध में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत आठ के आसपास है। यह संख्या परास्नातक में और कम, फिर शोधार्थियों की और भी कम है। देश में उच्च शिक्षा को लेकर नई नीतियां बनाने की बात चल रही है और पाठ्यक्रम और गुणवत्ता में सुधार को लेकर देश भर में बहस चल रही है। ऐसे में शोध की यह स्थिति निस्संदेह चिंताजनक है। विश्वविद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं और नए विश्वविद्यालयों का भविष्य अधर में अटका हुआ है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए आयोग को इन विषयों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। (प्रशांत तिवारी, जौनपुर)

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सूखे की मार

बिहार में चुनावी मौसम के बीच वहां की जनता का एक बड़ा हिस्सा पलायन के लिए मजबूर है। वजह सिर्फ इतनी है कि बिहार में अभी सूखे के हालात बन चुके हैं। आकड़ों पर गौर करें तो इस साल बिहार में औसत से एक-तिहाई कम बारिश हुई है, जिसके कारण खरीफ की फसलों के रकबे में भी एक-तिहाई की गिरावट देखने को मिली है। पिछले चार सालों से बिहार इस समस्या से जूझ रहा है।

सूखे के कारण बिहार में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी है, इसीलिए लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। उत्तर बिहार के ज्यादातर जिलों मे बारिश सामान्य से करीब पैंतालीस फीसदी तक कम रही। सूखे की मार इतनी ज्यादा है कि धान और गन्ने की खेती बुरी तरह मारी गई। पलायन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि अभी बिहार में चुनावी मौसम चलने के कारण आचार-संहिता लागू है, जिस वजह से बहुत-सी योजनाओं में काम रुका पड़ा है। इसलिए मजबूरीवश वहां का इंसान कहने को विवश है कि पेट जरूरी है, वोट तो बाद में भी दिया जा सकता है। (पंकज कसरादे, मुलताई)

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संस्कृति की जगह

क्या भारतीय संस्कृति सिर्फ इतिहास में रह गई है जो हमें तमीज सिखाती है, अपने से सभी बड़ों का आदर करना, गंगा-जमुनी तहजीब, रहन-सहन और पहनावे का ढंग सिखाती है? आज हमारी संस्कृति इतिहास में खोई नजर आती है। संस्कृति के तथाकथित रक्षक सिर्फ उन चीजों की बात करते हैं, जिनसे धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण हो जाए। बाकी चीजों की बातें वे भी नहीं करते, क्योंकि वे सभी रक्षक भी इस चीज के आदी हो गए है।

अब हमारी संस्कृति इतिहास की किताबों की धूल में गर्क के साथ मिल गई है। हम अपनी गंगा-जमुनी तहजीब को खत्म करते जा रहे हैं और हमारे तौर-तरीके और रहन-सहन सब बहुत आगे आ निकल गए हैं। अब हम भारतीय संस्कृति को बोझ की तरह ढो रहे हैं, क्योंकि हम ‘मॉडर्न’ हो रहे हैं! (असद शेख, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विवि)

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