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चौपाल: कश्मीर के साथ

पाकिस्तान के हालात बताते हैं कि वह और लक्षित हमले व बालाकोट जैसी कार्रवाई सहन नहीं कर पाएगा।

Author नई दिल्ली | Updated: August 8, 2019 3:09 AM
duniya mere aage, with kashmir, opinion about with kashmir, article 370, Bilateral relations, Jammu and Kashmir, Terrorism, Pakistan, International Agency Financial Action Task Force, United Nationsसांकेतिक तस्वीर।

राकेश सैन

जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और धारा 370 हटाने की ऐतिहासिक पहल से घरेलू परिप्रेक्ष्य ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी भारत लाभ वाली स्थिति में आ गया है। इससे वे ताकतें सन्निपातग्रस्त दिख रही हैं जो सोचती रहीं कि विवश और विभाजित भारतीय राजनीतिक व्यवस्था जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को छू नहीं सकती। जितना सन्न पाकिस्तान-अमेरिका हैं उससे अधिक हमारे वे लोग हैं जो धमकी देते थे कि इस धारा को छुआ तो केवल हाथ नहीं बल्कि पूरा शरीर जल जाएगा। दरअसल, वर्तमान हालात में पड़ोसी देश के साथ-साथ पूरी दुनिया को यह संदेश देना आवश्यक हो गया था कि जम्मू-कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग कहता ही नहीं बल्कि मानता भी है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल के अनुसार पाकिस्तान का सुन्न हो जाना इसलिए भी स्वाभाविक है कि यह कदम कश्मीर पर भारत-पाक वार्ता की रूपरेखा को पूरी तरह से बदलेगा।

गौरतलब है कि द्विपक्षीय संबंधों को बनाए रखने के लिए भारत ने लंबे अरसे से कश्मीर पर रक्षात्मक रुख अपनाया है। नई दिल्ली ने इसके लिए जम्मू-कश्मीर से जुड़े सभी लंबित मुद्दों पर बातचीत करने की हामी भरी और आतंकवाद को भी बर्दाश्त किया लेकिन अब, जब देश में कश्मीर की घरेलू स्थिति पूरी तरह से बदल गई, यह केंद्र शासित प्रदेश बन गया है, लद्दाख को भी इससे अलग कर दिया गया है, तब कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत का आधार ही खत्म हो गया है। अब पाक अधिकृत कश्मीर पर दावे को छोड़ कर कोई लंबित मामला नहीं बचा। इसी पाक-अधिकृत कश्मीर में गिलगित और बल्तिस्तान भी शामिल हैं। अब कश्मीर मसले के हल के लिए किसी पिछले दरवाजे की जरूरत भी खत्म हो गई है।

विदेश मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ मोर्चों पर भारत को अभी सावधान रहने की आवश्यकता है। राजनीतिक हताशा और घरेलू दबाव में पाकिस्तान भारत के इस फैसले का अंतरराष्ट्रीयकरण जरूर करेगा। लेकिन उसके विकल्पों पर यदि गौर करें तो वह हमारे खिलाफ सिर्फ दुष्प्रचार कर सकता है। भारत के फैसले के विरोध की आग को भड़काने और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद बढ़ाने का काम वह कर सकता है। हालांकि यह उसके लिए जोखिम भरा कदम होगा क्योंकि जम्मू-कश्मीर में यदि वह जेहाद भड़काने की कोशिश करेगा तो भारत न सिर्फ जवाबी कार्रवाई करेगा, बल्कि आतंकी वित्तपोषण रोकने के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स में भी उस पर दबाव बना सकता है, जिससे पाकिस्तान की आर्थिक सेहत और खराब हो सकती है।

पाकिस्तान के हालात बताते हैं कि वह और लक्षित हमले व बालाकोट जैसी कार्रवाई सहन नहीं कर पाएगा। वह इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जा सकता है, मगर हमारे यहां संवैधानिक स्थिति को बदलने संबंधी भारतीय कानून में किसी तरह का बदलाव अंतरराष्ट्रीय मामला नहीं रह गया है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव में अनुच्छेद-370 का जिक्र नहीं है। इसे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के महीनों बाद भारतीय संविधान में जोड़ा गया था, इसीलिए अपनी पहल से इसे हटाने या बदलाव करने का अधिकार भी भारत को ही है।

पिछले सत्तर सालों से भारतीय नेता कश्मीर को अपना अभिन्न अंग कहते आ रहे हैं पर उपरोक्त विवादित धाराओं को संविधान से हटा कर मौजूदा केंद्र सरकार ने कश्मीरियों को भी यह कहने का गौरव प्रदान कर दिया है कि भारत उनका अभिन्न अंग है। अभी तक यह रिश्ता एकतरफा-सा था और इस राज्य के भारत में पूर्ण विलय के मार्ग में ये धाराएं अघोषित बाधा सरीखी थीं जिन्हें केंद्र सरकार ने रुग्ण अंग की तरह संविधान से काट फेंका है। निश्चित ही जम्मू-कश्मीर का शेष भारत के साथ सेतुबंध कल्याणकारी व देश को सुदृढ़ करने वाला होगा।
, खंडाला फार्मिंग कॉलोनी, लिदड़ां, जालंधर

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