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चौपाल: पाठ का बोझ

संकट की घड़ी में ई-लर्निंग यानी आनलाइन पढ़ाई एक औजार बन कर उभरा है, लेकिन उन बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए जो इस आनलाइन पढ़ाई के कारण त्रस्त हो चुके हैं और कई बीमारियों के शिकार हो रहे। ऐसे में ई-लर्निंग के बजाय विद्यालयों को कोई और विकल्प तलाशना चाहिए, ताकि देश का हर विद्यार्थी प्राप्त कर सके।

मास्क पहने एक शिक्षिका अपनी कक्षा से ऑनलाइन पढ़ाती हुई।

पूर्णबंदी में धीरे-धीरे रियायतें दी जा रही हैं, लेकिन अभी तक शिक्षण संस्थाओं को खोलने की अनुमति नहीं मिली है। जिसके चलते शिक्षण संस्थानों ने आनलाइन कक्षाएं चलाने का रास्ता निकाला है। इसमें विद्यार्थियों को गूगल मीट, जूम आदि का उपयोग करके अध्ययन कराने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन आनलाइन कक्षा के दौरान बच्चों का पूरा ध्यान उनके फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर में होता है। इसका असर उनके शारीरिक, मानसिक, स्वास्थ्य से जुड़ी चीजों पर पड़ रहा है। आंखों में जलन, गर्दन में दर्द, पीठ में दर्द जैसी अन्य कई रोगों का शिकार छोटे बच्चे हो रहे हैं।

इसके मद्देनजर अब सरकार ने नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसके मुताबिक प्री-प्राइमरी विद्यार्थियों के लिए आनलाइन कक्षाएं रोजाना तीस मिनट से अधिक नहीं हो सकतीं। पहली से आठवीं कक्षा तक के लिए तीस से पैंतालीस मिनट तक के सिर्फ दो ही आॅनलाइन सत्र होंगे। इसी तरह कक्षा नौवीं से बारहवीं के लिए तीस से पैंतालीस मिनट तक के सिर्फ चार सत्र ही हो सकेंगे।

संकट की घड़ी में ई-लर्निंग यानी आनलाइन पढ़ाई एक औजार बन कर उभरा है, लेकिन उन बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए जो इस आनलाइन पढ़ाई के कारण त्रस्त हो चुके हैं और कई बीमारियों के शिकार हो रहे। ऐसे में ई-लर्निंग के बजाय विद्यालयों को कोई और विकल्प तलाशना चाहिए, ताकि देश का हर विद्यार्थी प्राप्त कर सके। शिक्षण पर हर एक विद्यार्थी का हक है। अंतिम और सबसे बेहतर विकल्प नियमित स्कूल ही हो सकते हैं।
’निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

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