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चौपाल: तटस्थता की ताकत

आज जब हम विश्व में चीन के बढ़ते प्रभाव की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि हमने अपने शक्ति केंद्र गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूत बनाने की कोई कोशिश न करके चीन को मौका दिया। अगर भारत अन्य सदस्य देशों के साथ मिल कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सार्थक और प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश करता तो आज निश्चित तौर पर दुनिया में चीन का इतना प्रभाव नहीं होता।

india china russia, india china tesnion, russia,रूस भारत और चीन के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में जुटा है। (रायटर्स/फाइल)

जब दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ- दो गुटों में बंटी हुई थी, तब इन दोनों से अलग था गुटनिरपेक्ष आंदोलन। दोनों में से किसी गुट में नहीं होने का दावा करने वाला यह गुट सदस्यता के हिसाब से दोनों गुटों से बहुत बड़ा था। इस आंदोलन ने दोनों महाशक्तियों और उनके गुटों के बीच संतुलन का काम भी किया। भारत इस आंदोलन का संस्थापक सदस्य और सबसे बड़ा और ताकतवर देश होने की वजह से इसका निर्विवाद नेता भी रहा। उस समय गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत का वैश्विक राजनीति में अच्छा प्रभाव था।

सोवियत संघ के विघटन के साथ ही सोवियत गुट खत्म हो गया और गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने खुद को अप्रासंगिक मान लिया। आंदोलन का सबसे बड़ा देश भारत भी इसके प्रति उदासीन होता गया और शायद इसी कारण अन्य सदस्य देश ने भी बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार इसे प्रासंगिक बनने की कोई कोशिश नहीं की। हाल के वर्षों में तो भारत ने इस आंदोलन से दूरी और बढ़ा ली है।

शायद इसीलिए 2016 और 2019 में भारत ने पहले की तरह शीर्ष स्तर से इसमें शिरकत ही नहीं की, जबकि इससे पहले ऐसा सिर्फ 1976 में हुआ था। सोवियत गुट के खत्म होने और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अप्रासंगिक होने से विश्व पटल पर एक शून्य बना। यही मौका था उस शून्य को भरने का और शक्ति के एक नए केंद्र को स्थापित करने का। चीन ने यह मौका लपका और दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया।

आज जब हम विश्व में चीन के बढ़ते प्रभाव की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि हमने अपने शक्ति केंद्र गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूत बनाने की कोई कोशिश न करके चीन को मौका दिया। अगर भारत अन्य सदस्य देशों के साथ मिल कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन को सार्थक और प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश करता तो आज निश्चित तौर पर दुनिया में चीन का इतना प्रभाव नहीं होता। अभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन खत्म नहीं हुआ है, जरूरत है इसे बदली परिस्थितियों के अनुसार बदलने और प्रासंगिक बनाने की।

भारत यह काम आसानी से कर सकता है, क्योंकि आज भी भारत इस आंदोलन का सबसे बड़ा और शक्तिशाली देश है। अब हम चीन और अमेरिका को दो गुट मान कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की एक नई इबारत लिख सकते हैं और चीन और अमेरिका की महत्त्वाकांक्षाओं पर लगाम लगा सकते हैं।
’बृजेश माथुर, बृज विहार, गाजियाबाद

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