नशे का दायरा

दिल्ली में केजरीवाल सरकार सरकारी ठेके बंद करके नई आबकारी नीति के तहत 849 नई शराब की दुकानें खोलने जा रही है, जिनमें रात के तीन बजे तक शराब मिलेगी।

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सांकेतिक फोटो।

दिल्ली में केजरीवाल सरकार सरकारी ठेके बंद करके नई आबकारी नीति के तहत 849 नई शराब की दुकानें खोलने जा रही है, जिनमें रात के तीन बजे तक शराब मिलेगी। अगर ये दुकानें रिहायशी इलाकों में न खोलकर बाजार, मालों में खोली जाएं तो किसी को एतराज नहीं होगा। जिसे शराब पीनी है, उसके लिए दुकान की दूरी कोई मायने नहीं रखती। दिल्ली के कई क्षेत्रों में आजकल शराब की नई दुकानें खोलने और पुरानी वहीं उसी स्थान पर चालू करने के संबंध में भारी विरोध और प्रदर्शन किए जा रहे हैं। रिहाइशी इलाकों में ये दुकानें खुलने से वहां का माहौल खराब हो जाता है।

बच्चों, महिलाओं और सभ्य पुरुषों का वहां से निकलना मुश्किल हो जाता है। अब रात तीन बजे तक शराब मिलेगी तो शराब पीने के आदती रात के तीन बजे तक गलियों में घूमेंगे। चोरी की घटनाएं भी बढ़ेंगी। एक तरफ केजरीवाल महिलाओं के हितों की बात करते हैं, उन्हें बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देते हैं, बुजुर्गों को मुफ्त तीर्थ यात्रा कराकर धर्म स्थापना का संदेश देते हैं, दूसरी तरफ रिहाइशी इलाकों में शराब के ठेके खोलकर उनका अहित कर रहे हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में तयशुदा नियमों को भी ताक में रखा जा रहा है। नियमानुसार शराब की दुकान के आसपास कोई स्कूल और धार्मिक स्थल नहीं होना चाहिए, लेकिन इन नियमों की दिल्ली में सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। लोगों का विरोध शराब या पीने वालों के खिलाफ नहीं है। बस वे यही चाहते हैं कि ये रिहायशी इलाकों में न हों।

हर रोज अखबारों में ऐसे विरोध और प्रदर्शन की खबरें छप भी रही हैं, लेकिन दिल्ली सरकार तटस्थ बनी हुई है और लोगों की मांग पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। क्यों हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी मूकदर्शक है? क्या वे अखबारी कतरनों के आधार पर खुद संज्ञान लेकर दिल्ली सरकार से जवाब-तलब नहीं कर सकते और कम से कम रिहाइशी इलाकों में शराब की दुकानें न खोलने संबंधी आदेश जारी कर सकते!
’चंद्र प्रकाश शर्मा, रानी बाग, दिल्ली

दिखावे का विकास

नीतीश सरकार 15 बरस पूरे करने के उपलक्ष्य में अपनी उपलब्धियां गिना रही है। जश्न, जलसों के आयोजन हो रहे हैं। पिछले पंद्रह वर्षों में सड़कें पहले के मुकाबले ज्यादा दुरुस्त हुए हैं, स्कूलों में शिक्षकों की बहालियां की गई हैं। मगर आज भी स्कूल,कालेज में शिक्षण एवं शिक्षणेतर कर्मियों के ढेर सारे पद रिक्त पड़े हैं और कई रिक्तियां तो प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी अधर में लटकाए रखी गई हैं।

राज्य सरकार के नुमाइंदे न्याय के साथ विकास का राग अक्सर अलापते हैं। वे पूर्ण शराबबंदी को जोड़ना नहीं भूलते हैं, क्योंकि उनका तर्क है कि इससे जितना राज्य के राजस्व का नुकसान होगा, उसी अनुपात में गरीब तबकों की आय बढ़ेगी। उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार कम होंगे। लेकिन अब सवाल पूछा जाने लगा है कि कितने पूंजी निवेश हुए, कितनों को स्थानीय उद्योगों में रोजगार मिला, पलायन किस हद तक रुके। इसके जवाब आते थे बिहार एक भूमि आबद्ध राज्य है, लिहाजा गुजरात की भांति यहां पूंजी निवेश होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यह बेतुका तर्क है।

दिलचस्प है, गुजरात में भी शराबबंदी है और वह एक धनी राज्य है। ऐसे में क्या शराबबंदी या इसके नफे-नुकसान की तुलना हम गुजरात के साथ कर सकते हैं? बिहार के लोग आसानी से पड़ोसी राज्यों में शराब पी आते हैं। क्या इस सच्चाई से कोई मुंह मोड़ सकता है? जब तक हमारा कानून निरीह को फंसाने, पीने वालों पर शिकंजा कसने पर ज्यादा जोर देगा, बनिस्बत इसके व्यापार करने वालों पर, तब तक यह पाबंदी बेमानी है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब निदोर्षों के घर, गाड़ी में शराब की बोतलें, पैकेट रख दिए गए और इस आरोप में वह लंबे समय तक जेलों में सड़ता रहा। ऐसे मामलों में उस व्यक्ति विशेष की उत्पादकता प्रभावित नहीं हुए होंगे? क्या इससे राज्य और उस परिवार की आमदनी नहीं घटी?
’मुकेश कुमार मनन, पटना, बिहार

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