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चैपालः किस ओर

आज के विकसित समाज में अराजकता, वैमनस्य, भ्रष्टाचार और कई तरह के नए-नए आपराधिक मामले बढ़ते जा रहे हैं। यह किसी भी विकसित समाज के लिए ठीक नहीं है।

Author August 20, 2018 5:34 AM
साहित्य, संगीत और कला से दूरी लोगों को संवेदनहीन बना रही है।

आज के विकसित समाज में अराजकता, वैमनस्य, भ्रष्टाचार और कई तरह के नए-नए आपराधिक मामले बढ़ते जा रहे हैं। यह किसी भी विकसित समाज के लिए ठीक नहीं है। इन सबके पीछे कहीं न कहीं यह छिपा हुआ सत्य है कि हमारा समाज साहित्य, संगीत और कला से बहुत दूर होता जा रहा है। इधर कंप्यूटर और इंटरनेट के इस्तेमाल से लोगों में साहित्य के प्रति रुझान दिनों दिन कम होता जा रहा है। यहां तक कि साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री पर भी असर पड़ा है। हमारे लोक संगीत और कलाएं भी दम तोड़ रही हैं। नाटक और नौटंकी की विधाएं भी गायब होती जा रही हैं। नौटंकी विधा तो लगभग गायब ही हो चुकी है। उत्तर भारत का लोकप्रिय संगीत आल्हा एवं कजली भी लगभग गायब हैं। सारा कुछ कंप्यूटर के ‘कट-पेस्ट’ जैसा होता जा रहा है।

साहित्य, संगीत और कला से दूरी लोगों को संवेदनहीन बना रही है। लोगों की बातचीत में कहावतें और मुहावरे गायब हो गए हैं। सूक्ति एवं नीतिपरक दोहे तथा श्लोकपाठ्यक्रमों से गायब ही हैं। लोगों को टीवी और मोबाइल की लत पड़ चुकी है। बहुत से लोग साहित्य की तरफ मुंह नहीं करना चाहते हैं। हर तरफ जल्दबाजी अर्थात शार्टकट अपनाया जा रहा है। परिणाम यह है कि लोग परीक्षा पास करने के लिए भी पुस्तकें नहीं पढ़ना चाहते बल्कि कुंजी के सहारे परीक्षा की वैतरणी पार करना चाह रहे हैं और काफी हद तक सफल भी हैं। लेकिन साहित्य, संगीत और कला से दूरी भविष्य में तमाम तरह के अपराधों को निमंत्रण देगी। हमें सोचना चाहिए कि ऐसा करके हम किस ओर जा रहे हैं।

राजेंद्र प्रसाद बारी, इंदिरा नगर, लखनऊ

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