संतों के वेश में

इलाहाबाद में संत नरेंद्र गिरि की मौत के मामले में जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि धार्मिक स्थलों पर किस तरह से अपराधियों ने साधुओं का छली रूप धारण कर रखा है।

महंत नरेंद्र गिरि। फाइल फोटो।

इलाहाबाद में संत नरेंद्र गिरि की मौत के मामले में जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि धार्मिक स्थलों पर किस तरह से अपराधियों ने साधुओं का छली रूप धारण कर रखा है। इस घटना ने साफ कर दिया है कि समाज को ऐसे साधुओं के वेश में छिपे अपराधियों का चेहरा उजागर करना होगा जो दुनिया, समाज और धर्म सबको बदनाम कर रहे हैं। इसके लिए संतों को एक संस्था बनानी चाहिए जो संत समाज मे छिपे बहरूपियों की पहचान कर उन्हें बाहर करे।

महंत नरेंद्र गिरि ने ऐसे ही मुद्दों की चर्चा शुरू की और साधुओं के वेश में छिपे डाकुओं की सूची भी सार्वजनिक की थी। तब शायद उनको नहीं मालूम रहा होगा कि ऐसे कार्यों के लिए अपनी जान की आहुति भी देनी पड़ सकती है। हैरानी की बात तो यह है कि नरेंद्र गिरि की मौत का इल्जाम खुद उनके ही शिष्य आनंद गिरि और आद्या प्रसाद तिवारी पर लगा है। सोशल मीडिया पर चल रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह से आनंद गिरि महाराजाओं जैसी जिंदगी जी रहा है, विदेश यात्राओं से लेकर महंगी गाड़ियों में सैर करना उसका शौक था।

आखिर ऐसे लोगों को साधू कैसे कहा जा सकता है? यह एक विडंबना भी है कि ऐसे साधुओं के साथ राजनेताओं की तस्वीरें भी देखने को मलिती रहती हैं। पूर्व में भी ऐसे कई साधू-संतों का राजनेताओं का गहरा संबंध उजागर हुआ है जो आज बलात्कार जैसे मामलों में सलाखों के पीछे हैं। यह तो सच्चे संतों के साथ जनता को भी देखना और सोचना चाहिए कि जो साधू होगा वह धन का लोभी नहीं होगा। और जो लोभी होगा वह संत नहीं होगा। ऐसा केवल हिंदू समाज मे ही नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों में भी देखा जा सकता है।

सही मायने में अब धर्म स्थल ऐसे अधर्मियों से बचे नहीं हैं जो अपराध करके साधुओं का चोला पहन कर तीर्थों में जाकर छुप जाते हैं ताकि गिरफ्तारी से बच सकें। पिछले दिनों पटना की पुलिस ने अयोध्या में ऐसे शख्स को गिरफ्तार किया जो दस साल से वहां महंत बना बैठा था। अयोध्या ही नहीं और तमाम धार्मिक स्थलों पर ऐसे अपराधी शरण लेते रहे हैं। कुख्यात डकैत शिव कुमार उर्फ ददुआ बरसात के दिनों में भगवा वेश धारण कर छुप जाता था। राजनीति, धर्म और बाहुबल का खुला खेल किसी से छिपा नहीं है। संत समाज को ऐसे अपराधियों से मुक्त कराने के लिए संतों-महंतों को ही आगे आना होगा और उसे धार्मिक स्थलों को राजनीति और अपराध का अखाड़ा बनने से रोकना होगा।
’मोहम्मद आसिफ, दिल्ली

कोष पर नजर

दिल्ली उच्च न्यायलय से केंद्र सरकार का यह कहना कि पीएम केयर्स फंड सरकारी नहीं है, इसलिए लिहाजा यह आरटीआइ कानून की धारा 2 (एच) के तहत नहीं आता है। क्या सबसे बड़े लोकतंत्र के संचालकों से इस तरह की बेरुखी की उम्मीद किसी को थी? जब पीएम केयर्स फंड से परोपकारी कार्य किए जा रहे हैं तो उसकी जानकारी सार्वजनिक करने में क्या हर्ज है? अब तो देश-दुनिया के लोग यही सोचेंगे कि शायद इसीलिए प्रधानमंत्री राहत कोष के स्थान पर इसे शुरू किया गया ताकि इसके लेनदेन पर कोई नजर न रख सके! सवाल है कि ये गैर सरकारी कोष कैसे हो सकता है, जबकि ये प्रधानमंत्री के नाम पर है और तीन केंद्रीय मंत्री इसके न्यासी हैं? आखिर क्यों नहीं इसे लेकर उठ रहे संदेह दूर किए जाने चाहिए?
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी,जमशेदपुर

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