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चौपाल: कुप्रथाओं की कैद

कहने में अच्छा लगता है कि लड़का-लड़की एक समान, पर असल में ऐसा वास्तविकता से कोसों दूर है। बहुत-सी प्रथाओं के जरिए स्वतंत्र भारत में भी स्त्रियों को ‘सामाजिक तानाशाही’ का सामना करना पड़ता है।

सांकेतिक फोटो।

स्त्री ममता की प्रतीक है, प्रेम का सागर है, नए युग और नई पीढ़ी की जननी है। इस रूप में हम पता नहीं, कब से स्त्री को देखने-सुनते और समझते आए हैं। लेकिन क्या हम उनके इस अस्तित्व को इसी रूप में वास्तव में स्वीकार कर पाते हैं? क्या हम आम पुरुषों के भीतर उनके प्रति सम्मान और समानता की भावना को कहीं संतोषजनक पाते हैं?

हकीकत यह है कि सामाजिक लिंग के रूप में उनके साथ-साथ भेदभाव हर जगह मौजूद है। यह परिवार से शुरू हो जाता है, जहां लड़कियां ऊंची शिक्षा भी ग्रहण कर लेती हैं, तब भी उन्हें वैवाहिक जीवन के जंजाल में पारंपरिक ढांचे का जीवन ही सौंप दिया जाता है और आखिरकार चूल्हे की डोर थमा दी जाती है। समाज एक ऐसी जकड़न है, जिसमें स्त्री के संघर्ष की नींव जन्म से ही रख दी जाती है।

कहने में अच्छा लगता है कि लड़का-लड़की एक समान, पर असल में ऐसा वास्तविकता से कोसों दूर है। बहुत-सी प्रथाओं के जरिए स्वतंत्र भारत में भी स्त्रियों को ‘सामाजिक तानाशाही’ का सामना करना पड़ता है। सच यह है कि देश आजाद होकर भी पूरी तरह से कुप्रथाओं का आंख मूंद कर अनुसरण कर रहा है, जो भेदभाव और अमानवीयता पर आधारित है। आज अगर देश को सशक्त और सुदृढ़ बनाना है तो शिक्षित युवाओं को इन कुप्रथाओं को मिटाना होगा।
’आनंद पांडिया, जयपुर, राजस्थान

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