चौपालः समाज की दिशा - Jansatta
ताज़ा खबर
 

चौपालः समाज की दिशा

‘नृशंसता का मानस’ (संपादकीय, 1 मार्च) पढ़ा। वह खबर ही रूह को कंपा देने वाली थी। बार-बार यही सोचना पड़ता है कि हम कहां जा रहे हैं! सभ्यता के विकास क्रम में किस मुहाने पर खड़े हैं कि सोचने-समझने या विचार करने की शक्ति ही जैसे खत्म हो गई हो! आखिर ऐसी घटना कैसे इस समाज में घट जाती है और समाज कहां होता है?

Author March 7, 2016 3:01 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

‘नृशंसता का मानस’ (संपादकीय, 1 मार्च) पढ़ा। वह खबर ही रूह को कंपा देने वाली थी। बार-बार यही सोचना पड़ता है कि हम कहां जा रहे हैं! सभ्यता के विकास क्रम में किस मुहाने पर खड़े हैं कि सोचने-समझने या विचार करने की शक्ति ही जैसे खत्म हो गई हो! आखिर ऐसी घटना कैसे इस समाज में घट जाती है और समाज कहां होता है? क्यों कोई इस मोड़ पर पहुंच जाता है कि जहां से सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है, मनुष्य और मनुष्यता जवाब दे जाती है, संवेदना का नामो-निशान नहीं बचता! किस मोड़ पर आ जाते हैं कि कुछ भी कहने-सुनने के लिए नहीं बचता, बस एक चुप्पी सामने होती है! ऐसे में संपादकीय में सही सवाल उठाया गया है कि आखिर कोई इतना जालिम कैसे हो सकता कि अपनी तीन माह की बच्ची के गले पर छुरी चलाते हुए उसकी रूह न कांपे!

यह सोच कर भी हैरानी होती है कि ऐसा नृशंस कृत्य कैसे संभव है! यह जरूर है कि ऐसे लोग समाज में ही रहते हैं, पर घोर एकांतिक जीवन जीते होंगे। अपने बारे में आसपास या मित्र, किसी से भी बात नहीं करते, नहीं तो कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान न हो सके। इस तरह की घटनाएं अक्सर मस्तिष्क के विस्फोट की ओर इशारा करती हैं। अकेलेपन का चरम आत्महंता प्रवृत्तियों का ही परिचायक है। यह अपराधशास्त्र के लिए शोध का विषय हो सकता है कि क्या संभव है और कैसे किस परिस्थिति में संभव है, पर मनुष्य और मनुष्यता के लिए किसी भी हालत में यह बात पचती नहीं। मनुष्यता का यह तकाजा है कि वह लोगों को संवेदनशील और सुनने-समझने की दुनिया का बनाए। मनुष्य को हर परिस्थिति में सुनने लायक बनना चाहिए।

जब-तब इस तरह की घटनाएं आती रहती हैं, यह हमारे सभ्यतागत विकास पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कि हम कहां हैं। किस बर्बरता में उलझे हैं कि हमें हमारा मनुष्य दिखाई नहीं देता। विचार प्रक्रिया और सामाजिक जीवन से ही मनुष्य की रक्षा की जा सकती है। मनुष्य की रक्षा हमेशा संवेदना, सहयोग, सहकार और सरसता के रास्ते ही की जा सकती है। मनुष्यता की कोई गोली नहीं आती कि किसी को खिला दिया जाए और वह एक दिन में आदमी बन कर सामने आ जाए। यह आदमी जो सामने है, वह लाखों-करोड़ों साल में बना है। खत्म होने में क्या है, वह तो एक पल की बात होती है, पर बनाने में पीढ़िया लग जाती हैं।

मनुष्य के निर्माण में परिवार, पड़ोस और पीढ़ियों का बहुत बड़ा दाय होता है, वह एक दिन की बात नहीं होती। सामाजिकता और संवेदनशीलता के साथ समानता भाईचारा, आपसी विश्वास और प्रेम के मूल्य से मनुष्य की रचना हुई है और हर समाज इसी मनुष्य की रक्षा के लिए आगे आता है। इसी में मानव जाति का भविष्य है। इस भविष्य पर इस तरह की घटनाएं एक हाहाकारी सवाल छोड़ जाती हैं कि हम विचार करें कि इस तरह की घटना कहीं भी न घटे।
’विवेक कुमार मिश्र, कोटा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App