संसद की गरिमा

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जितनी भूमिका बहुमत वाली सरकार की होती है, उतनी ही विपक्ष की भी, लेकिन अफसोस कि हमारे देश में विपक्ष बहुत कमजोर और संकीर्ण राजनीति का शिकार नजर आता है।

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सांकेतिक फोटो।

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जितनी भूमिका बहुमत वाली सरकार की होती है, उतनी ही विपक्ष की भी, लेकिन अफसोस कि हमारे देश में विपक्ष बहुत कमजोर और संकीर्ण राजनीति का शिकार नजर आता है। सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है, तभी सत्तारूढ़ दल अपने कार्यों को मर्यादा में रहते हुए जनता के हित में कार्य करता रहेगा, अन्यथा उसे पथभ्रष्ट होने से रोकना मुश्किल होगा।

मगर हमारे देश में राजनीति का स्तर इस कदर गिर चुका है कि विपक्ष कभी सरकार के अच्छे फैसलों पर संसद में अपनी झूठी शान के लिए हामी नहीं भरेगी। ऐसे में यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि कोई संसद के संसाधनों की बर्बादी की चिंता करे। मगर यह भी सच है कि अगर संसद में विपक्ष सरकार की नीतियों का विरोध नहीं करेगा, तो सरकार तानाशाही की राह चल पड़ेगी।पर अब सवाल तो यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और लोकतंत्र के मंदिर संसद की मर्यादा को कैसे कायम रखा जाए? क्या चुनाव इसके लिए कोई उपाय कर सकता है?
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

त्रासदी के जख्म

भोपाल गैस कांड को भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक हादसा माना जाता है। यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी से मिथाइल आइसो साइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था, जिसका उपयोग कीटनाशक के रूप में किया जाता था। यह घटना औद्योगिक विकास के रास्ते पर चल रही दुनिया के सामने आज भी एक यक्षप्रश्न है।

अगर सतर्कता न बरती जाए तो इंसान के लिए तमाम तरह की सुख-सुविधाएं देने वाला यह रास्ता कितना खतरनाक हो सकता है, यह सैंतीस साल पहले भोपाल में देखने को मिला। गैस के असर से कितने लोग मरे, कितने बीमार हुए और कितने आज तक उसके दुष्प्रभाव झेल रहे हैं, इसकी कोई निश्चित संख्या हमारे सामने नहीं है। आज तक पीड़ितों और पीड़ितों के परिजनों को इंसाफ नहीं मिल सका है। सरकारें बदलीं, सुनवाई चलती रही, मुआवजे की बात भी हुई, लेकिन दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली।

देश में उद्योगों को उत्तरदायी बनाने की अपर्याप्त वैधानिक व्यवस्था और सरकारों की लापरवाही के कारण पीड़ितों से न्याय दूर रहा। पीड़ित आज भी अस्पताल और अदालत के चक्कर काट रहे हैं। ऊंचे मानदंडों का पालन करना, पर्यावरण रक्षा के कानून सख्त बनाने के साथ उन पर अमल की कुशल व्यवस्था रखने से ऐसी दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। इस दर्द को हम भूल नहीं सकते, लेकिन इससे सीख लेकर भविष्य को जरूर सुधारा जा सकता है।
’विभूति बुपक्या, आष्टा, मप्र

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