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चौपालः सम्मान में भेद

परंपरा के मुताबिक कोई भी खिलाड़ी यदि विदेशी जमीन पर जीतता है तो उसे घर वापसी पर राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया जाता है।

Author September 11, 2018 1:58 AM
स्वर्ण पदक जीतने वाले विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया को हरियाणा सरकार ने तीन-तीन करोड़ रुपए देने की घोषणा की है।

सम्मान में भेद

हाल ही में इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित एशियाई खेलों में भारत के खिलाड़ियों ने अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए उनहत्तर पदक अपने नाम कर लिए। परंपरा के मुताबिक कोई भी खिलाड़ी यदि विदेशी जमीन पर जीतता है तो उसे घर वापसी पर राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया जाता है। लेकिन तमाम राज्यों से मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों की सम्मान राशि में इतना ज्यादा अंतर है कि यह कई खिलाड़ियों को ऐसा महसूस करने पर मजबूर कर सकती है कि काश वे किसी विशेष राज्य से तालुक रखते। स्वर्ण पदक जीतने वाले विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया को हरियाणा सरकार ने तीन-तीन करोड़ रुपए देने की घोषणा की है। ओड़िशा के दुती चंद जिन्होंने दौड़ में दो रजत पदक जीते हैं, उन्हें ओड़िशा सरकार प्रति पदक डेढ़ करोड़ देगी, यानी कुल तीन करोड़ रुपए।

उत्तर प्रदेश के सौरभ चौधरी को सरकार स्वर्ण पदक जीतने पर पचास लाख रुपए इनाम देगी। जबकि हेप्टाथलान में स्वर्ण पदक जीतने वाली पश्चिम बंगाल की खिलाड़ी स्वप्ना बर्मन को सरकार महज दस लाख रुपए और सरकारी नौकरी देगी। स्वप्ना के परिवार के पास अभी तक अपना घर तक नहीं है। जीतने के बाद उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि शायद अब उनके परिवार को अपनी छत नसीब हो जाए। साफ है कि कुछ स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की राशि रजत पदक जीतने वालों से भी कम है। खिलाड़ियों के इस तरह का भेदभाव क्यों किया जाता है। एशियाई खेलों में कई खिलाड़ी गरीबी से लड़ते-लड़ते आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं कि देश उनकी वजह से गौरवान्वित महसूस कर रहा है। यदि आज उनके साथ इस तरह का भेदभाव किया जाएगा तो उनका मनोबल गिरेगा। खिलाड़ियों ने अगर आज अपने जज्बे और बूते के दम पर देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फहराया है, तो सरकार को उनके सम्मान में कसर नहीं रखनी चाहिए।

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रोहित यादव, एमडी विवि, रोहतक

खर्च पर लगाम

विश्वविद्यालयों के स्तर पर होने वाली छात्र राजनीति के चुनाव प्रचार के लिए कड़े कानून बनाने की आवश्यकता है। चुनाव प्रचार के दौरान काफी पैसा खर्च किया जाता है, जिसका कोई प्रमाणित ब्योरा नहीं होता है कि किस संगठन ने कहां और कितनी मात्रा में खर्च किया। इसलिए सभी संगठनों द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान खर्च किए जाने वाले दायरे को निर्धारित किए जाने की जरूरत है। दिल्ली विश्वविद्यालय में फिलहाल छात्रसंघ चुनाव का माहौल है, जिसमें हर संगठन के उम्मीदवार जोर-शोर से अपने प्रचार के लिए हरसंभव तरीकों को अपना रहे हैं।

छात्र राजनीति और आम चुनाव में भी अक्सर यह देखा जाता है कि प्रचार के दौरान बांटे जाने वाले परचे अगले दिन या उसी दिन जमीन पर हजारों की मात्रा में पड़े हुए दिखाई देते हैं जिसके कारण सड़कें तक ढक जाती हैं। विश्वविद्यालय को चाहिए कि वह अधिक मात्रा में कागज का उपयोग न करने का प्रावधान निकाले, साथ ही डिजिटल प्रचार को महत्त्व दे, ताकि हमारे पर्यावरण और हमें जीवित रखने वाले पेड़ों पर रहम किया जा सके।

अयूब अली, दिल्ली

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