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चौपालः पशुओं की जगह

जिस तरह भारत की जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है, ठीक उसी प्रकार भारत में जानवरों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन उनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयास भी सार्थक परिणाम नहीं दे रहे हैं।

पहले जानवरों के पास खाली मैदान होते थे, पेड़-पौधे होते थे, जहां वे अपना आवास या ठिकाना बना कर अपना जीवनयापन करते थे।

भारत को आजाद हुए चौहत्तर साल हो गए और इन सालों में भारत ने असीम विकास किया। लेकिन एक जो बड़ा मुद्दा आमतौर पर अनदेखी का शिकार रहा है, वह है- विकास के साथ जानवरों की बिगड़ती हालत। भारत में निरंतर विकास चल रहा है, नई इमारतें खड़ी हो रही हैं, नई आवासीय कॉलोनियां बन रहीं हैं, कृषि करने वाले खेत आवासीय भूमि में बदलते जा रहे हैं, लेकिन इन सब विकास के बीच एक चीज भारत सरकार और भारत के लोग भूलते जा रहे हैं कि इस विकास के साथ भारत में रहने वाले जानवरों की हालत क्या होती जा रही है। पहले जानवरों के पास खाली मैदान होते थे, पेड़-पौधे होते थे, जहां वे अपना आवास या ठिकाना बना कर अपना जीवनयापन करते थे। जंगल होते थे, जहां से उन्हें खाद्य पदार्थ मिल जाता था, लेकिन वर्तमान निरंतर विकास की अवस्था को देखकर ऐसा लगता नहीं कि जानवरों के लिए सरकार या भारत के लोगों के भीतर कोई फिक्र है। सड़कों में जानवर इधर-उधर खाने के लिए मुंह मारते हैं, कूड़ा-कचरा खा जाते हैं। सड़कों पर जानवरों के झुंड लेटे रहते हैं, तमाम जोखिम के बीच। कई बार हादसों में उनकी मौत हो जाती है, लेकिन लोग अपनी वर्तमान दुनिया और विकास करने में इतने मशगूल हैं कि इस ओर उनका ध्यान भी नहीं जाता है कि जानवर भी हमारे बीच की ही कड़ी हैं।

जिस तरह भारत की जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है, ठीक उसी प्रकार भारत में जानवरों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन उनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयास भी सार्थक परिणाम नहीं दे रहे हैं। कुल जानवरों में पालतू जानवरों की संख्या काफी कम है। उनमें भी जो पालतू जानवर दूध नहीं देते हैं, उनको आवारा पशुओं की तरह सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को चाहिए कि वह जानवरों के समुचित देखभाल के लिए कोई विस्तृत योजना तैयार करे। विकास के लिए जिस प्रकार मनुष्य का होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार जानवरों की भी अपनी उपयोगिता है। जानवरों से अनेक प्रकार के लाभ हैं, जिनकी जानकारी भारत के लगभग सभी लोगों को है, पर उनके संरक्षण के विषय में कोई सार्थक प्रयास नहीं होता है। समृद्धि के साथ-साथ सर्वांगीण विकास किसी देश के विकसित होने का सूचक होता है।
’उदय प्रकाश सोनी, उन्नाव, उप्र

बेसुरी बोली
चुनावी माहौल में हो रहे घमासान के मद्देनजर मतदाता को लुभाने के लिए सियासत में विरोध के बेसुरे वाक्य और शब्दों का प्रचलन बढ़ना अस्वाभाविक है। ऐसे वचनों को संयत, सौम्य और संवैधानिक सीमा में रह कर मनप्रिय और कर्णप्रिय बनाते हुए लोकप्रिय भी बनाया जा सकता है। नालायक, कुएं का मेंढक, शकुनी मामा या नाग बन बैठना आदि शब्दों के साथ पोस्टर फाड़ना और तू-तड़ाक आदि को सहजता से नहीं लेना चाहिए। इनमें सब कुछ को ग्रामीण लोकोक्ति नहीं माना जा सकता, बल्कि इसमें दुराभाव ही झलकता है। सच है कि चुनाव, उनके परिणाम और सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन निकला तीर कमान से की तरह बोले गए शब्द वापस नहीं आते। इसलिए भाषा की मयार्दा का उल्लंघन कतई न हो।
’बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, उज्जैन, मप्र

 

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