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लाइलाज बीमारी

आज देशभर में राज्यों और केंद्र सरकार तक के स्वास्थ्य विभाग की मौजूदा स्थिति गंभीर है। विकट स्थिति तो यह है कि आने वाले दिनों में भी स्वास्थ्य सुविधा के विपरीत व्यक्ति अधिक से अधिक बीमारियों से ग्रसित होंगे।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (Express Photo)

देश में कोई भी कानून बनाया जाता है तो उसके पीछे जनहित का तर्क दिया जाता है दूसरी ओर मानव हमारा सबसे बड़ा संसाधन है। इससे हम अपने राष्ट्रीय संसाधन में वृद्धि करते हैं। लेकिन अगर मानव संसाधन का ही ह्रास होने लगे तो राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका नुकसान देखने को मिलता है। आज जीने के लिए संघर्ष प्राकृतिक अवस्था की भांति जारी है। कौन से लोग कब और किस प्रकार से बीमारी से ग्रस्त होंगे, कहना मुश्किल है। ऐसे में समाज और सरकार की जिम्मेदारी होती है कि मानव विशेष को ऐसी परिस्थिति प्रदान करें कि वह स्वस्थ जीवन यापन कर स्वयं समाज और राष्ट्र के विकास में उत्तरोत्तर अपना सकारात्मक योगदान दे सके।

आज देशभर में राज्यों और केंद्र सरकार तक के स्वास्थ्य विभाग की मौजूदा स्थिति गंभीर है। विकट स्थिति तो यह है कि आने वाले दिनों में भी स्वास्थ्य सुविधा के विपरीत व्यक्ति अधिक से अधिक बीमारियों से ग्रसित होंगे। एक ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रति एक हजार व्यक्ति पर एक चिकित्सक होने की बात करता है, जबकि हमारे यहां की स्थिति यह है कि ग्यारह हजार लोगों पर एक चिकित्सक है। जाहिर है, हमारी स्वास्थ्य ही बीमार है जिसके इलाज की जरूरत है। नित नई तकनीक के बावजूद ज्यादा बीमारियों का हमला बात का प्रमाण है कि हम विकास नहीं विनाश के रास्ते हैं।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर

मौत और सवाल
बिहार में चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी यह बुखार फैल रहा है। मीडिया की सक्रियता से यह मामला प्रकाश में आया और सरकार चेती, वरना किसी की भी नजर इस ओर नहीं जाती। किसी पूंजीपति, उद्योगपति, मंत्री, नेता या नौकरशाह का बच्चा किसी अस्पताल की लापरवाही में अगर मर जाता तो सभी अस्पतालों के लिए नए नियम बना दिए जाते, उस अस्पताल की मान्यता रद्द करके डॉक्टर को जेल भिजवा दिया जाता। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मुजफ्फरपुर में मरने वाले बच्चों में कोई बच्चा ऐसे अमीर और ताकतवर लोगों का नहीं है। मरने वाले बच्चे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हैं। इसीलिए यहां कोई कानून लागू नहीं है। देश-प्रदेश की सरकार जश्न मनाने में व्यस्त हैं। कुछ सांसदों ने लोकसभा में यह मुद्दा उठाया है। आम लोगों और विपक्षी नेताओं को चाहिए कि वे ऐसे मुद्दे पर सड़क से सदन तक संघर्ष कर इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाएं। मीडियाकर्मियों और नेताओं को भी चाहिए कि वे डाक्टरों के काम में बाधा न डालें और सत्ता से सवाल करने की हिम्मत दिखाएं।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरू, मधेपुरा

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