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चौपालः उपेक्षित स्कूल

हमारे देश का संविधान हर नागरिक को बेहतर शिक्षा मुहैया करने का वादा करता है। मगर आजादी के इतने दशकों के बाद भी गरीब बच्चों को क्या बेहतर शिक्षा मिल पा रही है?

Author July 11, 2018 04:39 am
बच्चों की शिक्षा की बात करें तो स्थिति यह है कि पांचवीं कक्षा के बच्चे अपनी किताबें शुद्ध-शुद्ध पढ़ भी नहीं पाते हैं।

उपेक्षित स्कूल

हमारे देश का संविधान हर नागरिक को बेहतर शिक्षा मुहैया करने का वादा करता है। मगर आजादी के इतने दशकों के बाद भी गरीब बच्चों को क्या बेहतर शिक्षा मिल पा रही है? आज आलम यह है कि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चे तो दूर, मध्यम वर्ग के बच्चे भी मुश्किल से दाखिला ले पाते हैं। आखिरकार गरीब बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ने के लिए मजबूर होते हैं। एक-दो राज्यों के कुछ अपवादों को छोड़ कर पूरे देश के सरकारी स्कूलों की हालत दयनीय बनी हुई है। सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि न वहां अच्छे शिक्षक पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, न बेहतर बुनियादी सुविधाएं हैं।

बच्चों की शिक्षा की बात करें तो स्थिति यह है कि पांचवीं कक्षा के बच्चे अपनी किताबें शुद्ध-शुद्ध पढ़ भी नहीं पाते हैं। बीतते वक्त के साथ सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है। दूसरी ओर निजी स्कूलों का तेजी से विकास हो रहा है। पिछले दस सालों में निजी स्कूलों की संख्या में पचहत्तर फीसद का इजाफा हुआ है, जबकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में सात फीसद की गिरावट आई है। विडंबना यह है कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों को शिक्षण के अलावा गैर-शिक्षण कामों को करने के लिए भी कहा जाता है। मसलन, जनगणना, सर्वेक्षण आयोजित करना और मतदान कराना आदि! इसके चलते बच्चों की शिक्षा बाधित होती है।

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अपने बजट को एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च किया जाता है। फिर भी सरकारी स्कूलों की स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। सरकार को अपनी शिक्षा नीति में व्यापक बदलाव हर हाल में करना चाहिए, वरना सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे बदलते आधुनिक समाज में पीछे रह जाएंगे। जरूरी यह है कि सरकारी स्कूल के बच्चों को भी गुणवत्ता आधारित तकनीक और आधुनिक शिक्षा मुहैया कराया जाए, जिसे हासिल कर ये बच्चे भी समाज को बेहतर बनाने में अपना योगदान दे सकें।

’पियूष कुमार, नई दिल्ली

अपराध का चेहरा

हाल ही में आई खबरों के मुताबिक एक केंद्रीय मंत्री ने भीड़ द्वारा एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या के मामले में दोषी साबित होकर सजा पाए और जमानत पर बाहर आए कैदियों का स्वागत फूलमाला के साथ किया। इससे इस विचार को ही बल मिलता है कि ऐसे राजनीतिक अपराधियों का मनोबल बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। सजायाफ्ता हत्यारों की जमानत पर एक केंद्रीय मंत्री द्वारा उनका स्वागत करना बेहद दुखद है। सवाल है कि ऐसा करके देश की जनता को क्या संदेश देने की कोशिश हो रही है?
दरअसल, आज यहां अपराधियों का राजनीतिकरण या राजनीति का अपराधीकरण हो गया है। नेता अपने क्षेत्र में जीत हासिल करने के लिए वहां के गुंडों, माफियाओं और अपराधियों की मदद लेते हैं। देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां ‘किसी भी तरह’ जीतने वाले व्यक्ति को टिकट देती हैं। इस दौड़ में कोई पढ़ा-लिखा, सभ्य, ईमानदार व्यक्ति आज के दौर में सफल नहीं हो सकता।

इस प्रकार, हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपराधी प्रवृत्ति के लोगों ने एक तरह से ‘अपहरण’ कर लिया है। मौजूदा संसद में ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा चौंतीस फीसद अपराधी और दागी सांसदों का चुन लिया जाना क्या बताता है? लोकतंत्र मानो मजाक बन कर रह गया है। निरपराध, गरीब लोग छोटे-छोटे अपराधों में दशकों से जेलों में बंद पड़े हैं। उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वे मुकदमा लड़ कर जेलों से मुक्त हो जाएं।

निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

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