ताज़ा खबर
 

शोषण चक्र

बाल संरक्षण के कई कानूनों के बाद भी आज तक बच्चों का शोषण बंद नहीं हो पा रहा है।

सांकेतिक फोटो।

बाल संरक्षण के कई कानूनों के बाद भी आज तक बच्चों का शोषण बंद नहीं हो पा रहा है। अपने आप को शिक्षित, आधुनिक और उच्च वर्ग का बताने वाले लोगों का इस दुष्कृत्य से जुड़ना गंभीर चिंता और शर्म की बात है। हाल ही में राज कुंद्रा का अश्लील फिल्मों के कारोबार मामले में पकड़ा जाना ऐसे तथाकथित सभ्य समाज की मानसिकता को प्रकट करता है, जो जरूरतमंद लड़कियों को अपना शिकार बना कर कमाई करना चाहता है। जैसी खबरें आ रही हैं, उससे यह साफ है कि मासूम और भोले-भाले बच्चों और लड़कियों को फिल्मी दुनिया का ग्लैमर और चमक-दमक दिखा कर अपने जाल में फंसाया जाता है और उनकी अश्लील फिल्में बना कर मोटी रकम कमाई जा रही है। इस दुष्कृत्य में शामिल संपूर्ण गिरोह को कड़ी सजा मिलनी चाहिए और उनका सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए।
’रामबाबू सोनी, कसेरा बाजार, इंदौर, मप्र

मूल्यवृद्धि की पीड़ा

पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बेतहाशा बढ़ती कीमतें उपभोक्ताओं का बजट बिगाड़ने लगी हैं। डीजल-पेट्रोल की मूल्यवृद्धि से जहां गाड़ियों का भाड़ा और वस्तुओं का परिवहन लागत बढ़ता जा रहा है, वहीं रसोई गैस गरीबों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। सबसिडी के दम पर गैस कनेक्शन लेने वाले गरीब ग्रामीण के लिए अब जब सबसिडी नगण्य हो चुका है और वे खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। पेट्रोलियम पर केंद्र और राज्य सरकारों का भारी-भरकम टैक्स उपभोक्ताओं को निचोड़ने के लिए काफी है। यह सही है कि महामारी के संकट के कारण सरकारों का खजाना खाली है और सरकारी खर्च उच्चतम स्तर पर है। दूसरी ओर तेल निर्यातक देशों का समूह ओपेक तेल की कीमतों को उच्च बनाए रखने के लिए न्यूनतम तेल उत्पादन का पक्षधर है। रही-सही कसर तेल कंपनियां पूरी कर दे रही हैं, जो कच्चे तेल की कीमतें घटने पर भी पेट्रोल-डीजल की कीमत कम नहीं करतीं।

पेट्रोलियम पर राजनीति भी इतनी हावी है कि विपक्ष पेट्रोलियम की महंगाई का ठीकरा केंद्र सरकार पर तो फोड़ती हैं, लेकिन जिन राज्यों में उनकी पार्टी की सरकारें हैं, उन्हें कीमतें कम करने को प्रेरित नहीं करती हैं। ऐसे में केंद्र सरकार से पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम करने की मांग महज दिखावा ही प्रतीत होती है। कोरोना में बढ़ी बेरोजगारी के कारण जब एक बड़ी आबादी की जेबें खाली हैं, उसकी माली हालत खराब होती जा रही है, उस पर पेट्रोलियम की लगातार बढ़ती कीमतें असहनीय होती जा रही हैं। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को जनता की पीड़ा समझते हुए अपने अनावश्यक खर्च को काट कर जनता को राहत देने के लिए इस दिशा में जरूरी कदम उठाने चाहिए।
’महेंद्र नाथ चौरसिया, सिद्धार्थनगर, उप्र

Next Stories
1 व्यवहार की स्वीकृति
2 बुजुर्गों की फिक्र
3 पेड़ से जीवन
ये पढ़ा क्या?
X