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चौपालः नदारद लोकतंत्र

हाल ही में भारत के तीन राजनीतिक दलों में चुनाव की खबर आई।
Author December 12, 2017 02:41 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल ही में भारत के तीन राजनीतिक दलों में चुनाव की खबर आई। लालू यादव हमेशा की तरह इस बार भी अपनी पार्टी राजद के निर्विरोध अध्यक्ष बने हैं तो पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मुफ्ती के आगे भी सदर के चुनाव में किसी और उम्मीदवार ने दावा नहीं ठोका। और अब कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में एकमात्र नामांकन से राहुल गांधी अध्यक्ष बन कर पार्टी में नंबर एक की हैसियत पा चुके हैं।

लोकतंत्र जिनके कंधों पर सवार होता है उन सियासी पार्टियों के इन चुनावों की खास बात है कि ये कहीं से भी चुनाव ही नहीं हैं। अर्थात लोकतंत्र के भीतर लोकतंत्र नहीं। ‘विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र’ में आंतरिक लोकतंत्र का न होना इस गौरव को मुंह चिढ़ाता है। जम्हूरियत के नाम पर हमारे पास कुछ ही परिवार हैं या सामाजिक-सांस्कृतिक कहे जाने वाले संगठन हैं जो बेहद सीमित विकल्प हमारे सामने रखते हैं और हमारे लिए उन्हें ही वोट देने की मजबूरी होती है।
इस व्यवस्था में लोकतंत्र तो है मगर वह पहली सीढ़ी पर ही नदारद है।

आम इंसान, जो राजनीति में रुचि रखता है उसके लिए ऐसी व्यवस्था में आगे बढ़ना नामुमकिन-सा हो जाता है। चुनाव सुधार की बात होती है तो सबसे पहले पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की बहाली सुनिश्चित करनी होगी। आज का दृश्य देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति ढेर सारे आधुनिक सामंतों के हाथों में है। ये निर्विवाद और निर्विरोध अपने पदों पर काबिज रहते हैं! इन्हीं की बातों को बिना किसी स्वतंत्र चेतना के मान लेने वाले किसी एक छोटे सामंत को चुनना है हमें। अच्छा संकेत है कि गुजरात चुनावों में भाजपा ने राहुल गांधी के बहाने कांग्रेस पर तंज कस कर राजनीतिक दलों में भीतरी लोकतंत्र को एक मुद्दा बना दिया है। जरूरत है कि इस मुद्दे को आगे लेकर चला जाए।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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