ताज़ा खबर
 

चौपालः असुविधा के वाहन

दिल्ली में पिछले छह साल से दिल्ली परिवहन निगम यानी डीटीसी के बेड़े में एक भी नई बस शामिल नहीं हुई है। कम होती बसों की संख्या ने सुबह और शाम के व्यस्त समय में यात्रियों की परेशानियां बहुत बढ़ा दी है।

दिल्ली में पिछले छह साल से दिल्ली परिवहन निगम यानी डीटीसी के बेड़े में एक भी नई बस शामिल नहीं हुई है।

हमारे देश में अभी भी ऐसे तमाम लोग हैं जो इक्कीसवीं शताब्दी में भी गाड़ी, मेट्रो में सफर करने का खर्च नहीं उठा सकते। कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने अभी तक गाड़ी में सफर करने का लुफ्त नहीं उठाया है। वे अपना पूरा जीवन बस, लोकल ट्रेन में ही धक्के खाकर गुजार देते हैं। ऐसे में उन लोगों को अब कई वर्षों से कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

दिल्ली में पिछले छह साल से दिल्ली परिवहन निगम यानी डीटीसी के बेड़े में एक भी नई बस शामिल नहीं हुई है। कम होती बसों की संख्या ने सुबह और शाम के व्यस्त समय में यात्रियों की परेशानियां बहुत बढ़ा दी है। मौजूदा समय में तो यात्रियों को तो और ज्यादा परेशानी हो रही है, क्योंकि फिलहाल बस में बीस ही यात्रियों को बैठने देते हैं। अधिकतर बसें पहले से ही भरी रहती हैं, जिससे आगे वाले स्टैंड पर यात्रियों को घंटों तक बसों के लिए इंतजार करना पड़ता है।

हालत तो अब यह है कि पुरानी बसें अपनी तय किलोमीटर पूर्ण कर सड़कों से हटती जा रही हैं। डीटीसी के बेड़े में बसों की संख्या पहले से भी घट गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में दिल्ली को करीब ग्यारह हजार बसों की आवश्यकता है। इन बसों में पचास-पचास फीसद डीटीसी और क्लस्टर का अनुपात तय किया गया है, ताकि सार्वजनिक परिवहन को बेहतर तरीके से संचालित किया जा सके।

दिल्ली में डीटीसी के पास पांच हजार पांस सौ आवश्यकता है और डीटीसी इस समय 3762 बसें ही संचालित कर रहा है। गौरतलब है कि बसों की संख्या में कमी होने के कारण मध्यवर्गीय परिवार और कमजोर तबकों के लोगों को आने-जाने में कई तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। इस बारे में सरकार को जल्द से जल्द फैसला लेने की आवश्यकता है।
’निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद, उप्र

लापरवाही का हासिल
बीते कुछ दिनों के दौरान कोरोना मरीजों की संख्या में गिरावट के साथ कुल सक्रिय मामलों में कमी के साथ यह महामारी काबू में दिखने लगी है। लेकिन अभी इसे लेकर सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता है कि महामारी पूरी तरह से समाप्त हो गया है। ऐसी स्थिति कब आएगी? जब भी आए, तब तक शासन-प्रशासन के साथ आम जनता के लिए भी सतर्कता बनाए रखना आवश्यक है। शायद इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री ने कोरोना से बचाव को लेकर एक बार फिर संदेश जारी किया। उनकी इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है कि जब तक जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं। सब जान रहे हैं कि कोरोना से बचाव का उपाय सेहत के प्रति सतर्कता, एक-दूसरे से दूरी बना कर रखना और मास्क का इस्तेमाल करना है। लेकिन इसके बावजूद लापरवाही देखने को मिल रही है।

सबसे ज्यादा विकट परिस्थितियां तब लगती हैं जब लोग बाजार में बिना मास्क लगाए घूमते नजर आते हैं। एक दूसरे से दूरी बरतने के नियम का पालन करना तो दूर, बाजारों में पहले से अतिरिक्त भीड़ देखने सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है? हमारा अपने ही स्वास्थ्य के प्रति कोई ध्यान नहीं। जब हम सब जानते हैं कि महामारी ने कितनी विकट परिस्थितियों को जन्म दिया है, तब फिर यह बात समझ नहीं आती! पूर्णबंदी में हुई अनेक समस्याएं अब ढील मिलने के साथ दूर हो रही हैं। लेकिन उन सभी समस्याओं का मूल कोविड अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अगर सावधानी नहीं बरती गई तो जो लापरवाही देखी जा रही है, उसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं।
’काव्यांशी मिश्रा, मैनपुरी, उप्र

 

Next Stories
1 चौपाल : प्रतिगामी प्रवृत्ति
2 चौपाल: व्यूह के विरुद्ध
3 चौपाल: मुश्किल समय
ये पढ़ा क्या?
X