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कथनी और करनी

हाल ही में दिल्ली सरकार ने अपना बजट जारी किया है। बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खर्च करने के लिए सरकार ने अच्छा पैसा आबंटित किया है। यह उसके घोषित सरोकारों के अनुरूप ही है, अगर इसका असली लाभ जरूरतमंद तबकों तक पहुंच सके। लेकिन पता नहीं क्यों सरकार को […]

Author July 14, 2015 18:14 pm

हाल ही में दिल्ली सरकार ने अपना बजट जारी किया है। बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खर्च करने के लिए सरकार ने अच्छा पैसा आबंटित किया है।

यह उसके घोषित सरोकारों के अनुरूप ही है, अगर इसका असली लाभ जरूरतमंद तबकों तक पहुंच सके। लेकिन पता नहीं क्यों सरकार को लगता है कि उसे अपने कामों को जनता तक पहुंचाने के लिए भारी प्रचार की जरूरत है। योजनाओं का लाभ जनता तक तंत्र की ईमानदारी से पहुंचता है, प्रचार या विज्ञापन से नहीं। सरकार ने इस साल विज्ञापन के मद में पांच सौ बीस करोड़ रुपए का बजट आबंटित किया है।

पिछले साल यह बजट सिर्फ पच्चीस करोड़ रुपए था। केजरीवाल सरकार ने इसे कई गुणा बढ़ा दिया है। इस पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने याद दिलाया है कि उनके कार्यकाल में प्रचार पर कभी तीस करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं खर्च किया गया। सवाल है कि आम आदमी की पार्टी होने का दावा करने वाली दिल्ली सरकार को पांच सौ बीस करोड़ रुपए प्रचार के मद में खर्च करने की आखिर क्या जरूरत है!

सच तो यह है कि आम आदमी पार्टी की कथनी और करनी का अंतर वक्त के साथ बढ़ता जा रहा है। देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल ने कभी लोकपाल आंदोलन चलाया था। पर अब जब सत्ता उनके हाथ में है, तब दिल्ली लोकायुक्त की कुर्सी खाली पड़ी है।

दिल्ली हाईकोर्ट के नोटिस दिए जाने के बाद भी इतने समय से लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हुई है। कभी सरकारी बंगला या गाड़ी नहीं लूंगा जैसी बातों का दम भरने वाले केजरीवाल के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके आवास में बिजली का बिल एक लाख पैंतीस हजार रुपए कैसे आ गया? इसके अलावा, साफ-सुथरी राजनीति करने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी अपने मंत्रियों पर समय रहते उचित कार्यवाही करने में नाकाम रही है।

सोमनाथ भारती पर उनकी पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा का आरोप और जितेंद्र सिंह तोमर की फजऱ्ी डिग्री का विवाद, इन सबसे लोग परिचित है। केजरीवाल पर तानाशाह होने का इल्जाम भी लगता रहा है। इसी के चलते पार्टी के संस्थापक नेताओं में से प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने केजरीवाल से दूरी बना ली। एक समय केजरीवाल के सबसे करीबी साथी रहे प्रशांत भूषण ने तो इस प्रचार बजट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में घसीटने का ऐलान भी कर दिया है।

बहरहाल, आजकल राजनीति में चुनाव हारने के बाद राजनेता कहते हैं कि वे सरकार की उप्लब्धियों को जनता तक सही से नहीं पहुंचा सके, इसलिए चुनाव हार गए। लेकिन सरकार अगर काम करती है तो वह काम जनता तक अपने आप पहुंच जाता है, उसे पहुंचाने के लिए किसी भी तरह का ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि काम खुद बोलता बोलता है।

 

नदीम अनवर, लक्ष्मी नगर, दिल्ली

 

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