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चौपाल: शोषण के दरवाजे

विभिन्न पहलुओं पर विचार करें तो संविदा पर नौकरी एक प्रकार का बंधुआ मजदूरी साबित होगी, जिसमें पांच सालों तक कर्मचारियों का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होगा जो मानवीय संवेदना के खिलाफ है।

भारत में कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोगों की नौकरियां गई हैं। (एक्सप्रेस फोटो)

हमारा बहस लगातार इस बात पर रहा कि हम विभिन्न प्रकार के नौकरियों में स्थायी, नियमित, पूर्णकालिक वेतनमान, पदोन्नति और पेंशन चाहते हैं, जो नौकरी पर निर्भर लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण है। नौकरी सिर्फ एक व्यक्ति करता है, लेकिन उसके ऊपर पूरा परिवार आश्रित हो जाता है और इसी प्रकार की नौकरियों के लिए सभी अभ्यर्थी विभिन्न प्रकार के शहरों में रह कर अथक परिश्रम करके प्राप्त करना चाहते हैं।

वे लोग अपने भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार एक नई पहल पर विचार करने जा रही है, जिसमें वर्ग ख और ग की नौकरियों में पांच वर्ष संविदा पर रखा जाएगा, जिसमें हर छह महीने में उनका सतत् मूल्यांकन किया जाएगा। इसमें उनको कम से कम साठ प्रतिशत के साथ पांच वर्ष तक खरा उतरना पड़ेगा, अन्यथा उनकी नौकरी चली जाएगी।

सवाल उठता है कि मूल्यांकन का मापदंड क्या होगा? मूल्यांकनकर्ता कौन होगा? हमारा देश विविधताओं भरा पड़ा है, जहां पर धर्मवाद, जातिवाद, वर्गवाद, क्षेत्रवाद और लिंगभेद लोगों के मन में कूट कूट के भरा पड़ा है। ऐसे में हम किसी पारदर्शितापूर्ण मूल्यांकन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। दूसरी सबसे अहम बात यह है कि पांच वर्ष तक कर्मचारियों को मानदेय दिया जाएगा, जो पूर्ण वेतन से काफी कम होगा। इससे कर्मचारियों को अपने परिवार का भरण-पोषण करने में भी कठिनाइयां आएंगी।

अगर विभिन्न पहलुओं पर विचार करें तो संविदा पर नौकरी एक प्रकार का बंधुआ मजदूरी साबित होगी, जिसमें पांच सालों तक कर्मचारियों का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होगा जो मानवीय संवेदना के खिलाफ है, इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार को इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
’शैलेश मिश्र, बीएचयू, उप्र

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