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चौपाल: खतरे के विषाणु

पहले ही महामारी की गंभीर चुनौतियों के बीच बर्ड फ्लू का खतरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। देश के अनेक राज्यों से पक्षियों की संदिग्ध मृत्यु की खबरें सुर्खियों में हैं। हिमाचल प्रदेश में करीब अठारह सौ पक्षियों की मृत्यु हो चुकी है।

Birdसांकेतिक फोटो।

मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, झारखंड और केरल में भी कौवों और प्रवासी पक्षियों की मृत्यु के मामले लगातार सामने आ रहे हैंं। इन मृत पक्षियों की जांच में बर्ड फ्लू की पुष्टि हुई। गौरतलब है कि देश में पहली बार साल 2006 में महाराष्ट्र में अट्ठाइस स्थानों और गुजरात में एक स्थान पर यह बीमारी फैली थी।

इस दौरान करीब दस लाख पक्षियों को मारा गया था और लगभग 2.7 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया गया था। देश में अब तक उनचास बार अलग-अलग राज्यों में यह बीमारी फैली है और लाखों पक्षियों को मारा गया। जून 2017 में कृषि मंत्रालय ने एवियन इन्फ्लूएंजा एच5एन8 और एच5एन1 से देश को मुक्त घोषित दिया था। लेकिन लगातार हो रही पक्षियों की मृत्यु यह संकेत दे रही है कि बर्ड फ्लू की दहशत दोबारा पैर पसारने लगी है।

दरअसल, एवियन इन्फ्लूएंजा विषाणु एच5एन1 को बर्ड फ्लू का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। यह विषाणु पक्षियों के साथ ही इंसानों के लिए भी खतरनाक होता है। इंसानों में इसके लक्षण बेहद सामान्य होते हैं, जैसे सर्दी, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ और बार-बार उल्टी आना।

यही कारण है कि कई लोग इसके शिकार होते हैं, लेकिन उन्हें अहसास नहीं होता है। जरूरी है कि इस तरह के लक्षण किसी भी व्यक्ति को हो तो तुरंत नजदीकी अस्पताल या फिर डॉक्टर से संपर्क करे, ताकि एवियन इन्फ्लूएंजा विषाणु के फैलाव को रोका जा सके।
’गौतम एसआर, भोपाल, मप्र

सृजन संवाद

सृजन शाश्वत है कोई परंपरा नहीं। कोई भी वैश्विक सुगमताएं जीवनयापन के तौर-तरीके आसान कर सकती है, लेकिन सृजनात्मकता को बाहर नहीं ला सकती। ‘अभिव्यक्ति’ सभी मनुष्य के अंदर अंतर्निहित है। जरूरत है उसे सामाजिक मंच देने की। जिंदगी की इस आपाधापी में मनुष्य अपनी मनुष्यता को खो चुका है।

‘तकनीकी के साथ सृजन’ समीचीन है। समस्याएं और उसके रूप में कोई अंतर नहीं होता फिर भी लोग अपनी आशा को जीवंत किए रहते है। संवाद की इस अधुनातन परंपरा में हर रोज चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ‘नया’ होना वह ‘तोरण द्वार’ है जहां सृजनात्मक कार्यशालाओं का आयोजन होता है।

अकेलेपन और सामाजिकता में सिर्फ सकारात्मक सोच और संवाद परंपरा का अंतर होता है। अभिव्यक्ति एवं सृजनात्मक शैली में संलग्न कर्मियों को प्रकृति के साथ साहचर्य स्थापित करते हुए वस्तुस्थिति का सिंहावलोकन करना चाहिए।
’देवेश त्रिपाठी, संत कबीर नगर, उप्र

युवा ऊर्जा

महामारी के चलते देश में बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। हमारे देश में पहले से ही असंख्य युवा बेरोजगार हैं, लेकिन कोविड-19 की वजह से जिन लोगों के पास रोजगार था, सब कुछ बंदी के कारण वह भी धीरे-धीरे छिन गया। भारत एक युवा देश है। बल्कि युवाओं के मामले में हम विश्व में सबसे समृद्ध देश हैं।

यानी दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा हमारे देश में युवा हैं। नया साल आ चुका है। इससे पहले ही केंद्र सरकार ने बड़े फैसले किए हैं, जिसमें सरकार ने शहरों के विकास के लिए 7,725 करोड़ रुपए विकास मद में देने की बात कही। इससे तीन लाख लोगों को रोजगार मिलेगा।

जब हम युवाओं के सहारे देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की बात करते हैं, तो इस बात को समझना जरूरी है कि युवा होना केवल जिंदगी में जवानी का एक दौर नहीं होता है जिसे हम सिर्फ आंकड़ों में शामिल करके गर्व करें। यह महज उम्र की बात नहीं होती। यह विषय होता है असीमित संभावनाओं, सृजनात्मकता, कल्पनाओं की उड़ान, उत्सुकता, उतावलेपन के दौर का।

यह समय होता है सपनों को देखने और उन्हें पूरा करने का, ऊर्जा और हिम्मत से भरपूर होने का। अगर इस सबको व्यर्थ किया जाएगा या व्यर्थ हो जाने की स्थितियां बनाई जाएंगी तो उसका खमियाजा समाज और देश को उठाना पड़ेगा।
’रूबी सिंह, गोरखपुर, उप्र

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