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टूटता भरोसा

रोहित वेमुला की आत्महत्या ने एक बार फिर भारत की दलित राजनीति को आहत किया है। कोई पार्टी तुरंत इस आग में हाथ सेंकने पहुंच जाती है, तो कोई इससे अपने बचाव में लगी हुई है।

नई दिल्ली | January 25, 2016 12:01 AM

रोहित वेमुला की आत्महत्या ने एक बार फिर भारत की दलित राजनीति को आहत किया है। कोई पार्टी तुरंत इस आग में हाथ सेंकने पहुंच जाती है, तो कोई इससे अपने बचाव में लगी हुई है। सवाल है कि क्या ऐसी राजनीति का शिकार हुए छात्रों को उनका हक मिल पाएगा या ऐसे ही अन्य प्रकरण सामने आने पर भी प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाएगा।

रोहित का अंतिम पत्र भारतीय छात्र राजनीति के कई पहलुओं को उजागर करता है। दलित राजनीति का यह नया प्रकरण नहीं है। इससे पहले भी कई छात्र इसका शिकार हो चुके हैं। किसी भी विश्वविद्यालय में छात्र संघ के गठन का उद्देश्य युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अवगत कराना और उनमें राजनीतिक चेतना का संचार करना होता है। पर यह विचारधारात्मक प्रतिस्पर्धा का शिकार हो जाता है। ये वैचारिक टकराव जब प्रबल रूप ले लेते हैं तो छात्रों को वैचारिक रूप से संकुचित कर देते हैं। यही वैचारिक मतभेद हिंसा का रूप धारण कर लेते हैं, जिसके शिकार रोहित वेमुला जैसे छात्र होते हैं। राजनेता इस मतभेद में केवल अपना लाभ ढूंढ़ते हैं।

केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को यह विचार करना चाहिए कि एक ओर तो वह आंबेडकर की मूर्ति पर माल्यार्पण करके उनका गुणगान कर रही है और दूसरी ओर उनके समर्थकों से बात करने से भी कतराती है। पार्टी को इस दोहरी राजनीति से बचना चाहिए। प्रत्येक विश्वविद्यालय प्रशासन को ठोस कदम उठाते हुए छात्र संगठनों में नैतिक मूल्यों की वृद्धि पर जोर देना चाहिए। अगर यही वैचारिक मतभेद सकारात्मक हों तो युवाओं को नई दिशा मिल सकती है। किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में जब कोई दलित छात्र खुद को महफूज नहीं पाता, तो निश्चित रूप से यह चिंता का विषय है। (लोकेश सिंह, खंडवा (म.प्र))

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दोष किसका
हम लोग गलत का विरोध तो करते हैं, लेकिन क्या सही का समर्थन करते हैं? कहीं गलत के विरोध के पीछे यह मंशा तो नहीं रहती कि दूसरों की तरह हमें भी लूटने का मौका मिले? अन्यथा हम सभी जानते और देखते हैं कि एक सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोधी नेता और जनसमूह आवाज उठाते हैं और उस सरकार को हटा देते हैं, लेकिन कुव्यवस्था पहले से अधिक हो जाती है। फिर दूसरे नेता और उनके समर्थक जनसमूह आवाज उठाते हैं और इस तरह व्यवस्था को सही करने के नाम पर सरकार बदलती रहती है और कुव्यवस्था और अधिक बढ़ती चली जाती है। आखिर ऐसी गलत परंपरा हमने क्यों बना रखी है? इसका दोष हम किसे दे सकते हैं? हम लोग ही तो दोषी हैं, जो सही नेता नहीं चुन पाते। (आमोद शास्त्री, दिल्ली)

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सराहनीय पहल
अपने चुनावी वादे को निभाते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं को राज्य सरकार की नौकरियों में पैंतीस फीसद आरक्षण देकर एक अनुसरणीय कार्य किया है। इस कदम से जहां कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी वहीं उनके सामाजिक और आर्थिक स्तर में व्यापक बदलाव आ सकेगा। हालांकि महिला शिक्षा के मामले में बिहार की स्थिति खराब है, लेकिन सरकार के इस कदम से उसमें भी सुधार की उम्मीद बनती है। राज्य के कुल श्रम-बल में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ नौ फीसद है, जो देश में निम्नतम है। राज्य सरकार के इस निर्णय से राज्य की महिलाओं की स्थिति में सुधार की पूरी संभावना है।

राज्य सरकार ने संविधान में वर्णित अनुच्छेद 14 और 15 के प्रावधानों पर अमल करते हुए सकारात्मक कार्य की अवधारणा को मजबूत किया है। इस फैसले से बिहार के पारंपरिक समाज में महिलाओं के प्रति मानवीय गरिमा में वृद्धि और सामाजिक न्याय की भावना में बढ़ोत्तरी होगी। महिलाओं में शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर, सहयोगी भावना, प्रतिस्पर्धी माहौल, वैचारिक आदान-प्रदान आदि में वृद्धि की उम्मीद है। वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों से भलीभांति परिचित हो सकेंगी और सामाजिक कुप्रथाओं, अंधविश्वास और शोषण से विभिन्न स्तरों पर सबलता के साथ मुकाबला कर सकेंगी। आवश्यकता इस बात की है कि इस फैसले को दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए और लालफीताशाही पर नकेल कसते हुए क्रियान्वित किया जाए। आज जहां देश बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान में जोरशोर से जुटा है, वहीं बिहार ने महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक नई शुरुआत की है। (भास्कर, मुखर्जी नगर, दिल्ली)

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विकास बनाम कुपोषण

कुपोषण की समस्या देश के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह कैसी विसंगति है कि एक तरफ तो हम उभरती अर्थव्यवस्था के दावे करते नहीं थकते, और दूसरी ओर कुपोषण जैसी भयावह समस्या देश के विकास को झूठा साबित कर रही है। ऐसे में सकल घरेलू उत्पाद की तीव्र वृद्धि का कोई अर्थ नहीं रह जाता, क्योंकि हमारे देश में पोषण का स्तर सामान्य से अत्यंत कम है। भूख और कुपोषण संबंधी रिपोर्ट के अनुसार देश में पांच वर्ष से कम आयु के लगभग बयालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। भारत के आठ राज्यों (ओड़ीशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़) में जितना कुपोषण है, उतना अफ्रीका और सहारा उपमहाद्वीप के गरीब देशों में भी नहीं है।

दुनिया भर में कुपोषण से पांच वर्ष तक की आयु वाले जितने बच्चों की मौत होती है, उनमें से इक्कीस प्रतिशत बच्चे भारतीय होते हैं। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुछ इलाकों में कुपोषण की समस्या बहुत ज्यादा है। ऐसा नहीं कि देश में इस मसले पर काम नहीं हुआ, कुपोषण से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने एकीकृत बाल विकास योजना शुरू की, पर वह कारगर नहीं हो पाई। मिड-डे-मील योजना भ्रष्टतंत्र का शिकार हो गई। समय-समय पर कुपोषण पर काबू पाने के लिए योजनाएं बनती रही हैं, पर नतीजा ढाक के तीन पात जैसा ही रहा। जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया। कुपोषण उन्मूलन के लिए यह आवश्यक है कि जो भी योजनाएं बनें, वे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, साफ पेयजल की उपलब्धता और पोषाहार को ध्यान में रख कर बनें। साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पारदर्शी और दुरुस्त करने की आवश्यकता है, ताकि हर जरूरतमंद तक अन्न पहुंचे और उसे भरपेट भोजन मिल सके। (पवन कुमार मौर्य, वाराणसी)

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