ऊंट के मुंह में जीरा

कोरोना की वजह से हुई मौतों पर केंद्र सरकार ने पचास हजार रुपए का मुआवजा देने की बात कही है। यह पैसा राज्यों को देना होगा। जहां भाजपा की सरकार है वहां तो ठीक, मगर विपक्षी दलों की सरकार होने पर फिर क्या होगा, अगर वे राज्य यह मुआवजा देने से इंकार कर दें, तो […]

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (Pixabay.com)

कोरोना की वजह से हुई मौतों पर केंद्र सरकार ने पचास हजार रुपए का मुआवजा देने की बात कही है। यह पैसा राज्यों को देना होगा। जहां भाजपा की सरकार है वहां तो ठीक, मगर विपक्षी दलों की सरकार होने पर फिर क्या होगा, अगर वे राज्य यह मुआवजा देने से इंकार कर दें, तो कैसे वह पीड़ित परिवारों को मिलेगा। आमतौर पर सड़क दुर्घटना में हुई मौत पर पीड़ित परिवार को दो से चार लाख रुपए मिलते हैं।

इसी तरह घायलों को भी एक लाख या पचास हजार रुपए का मुआवजा मिल जाता है। तब एक परिवार का खाता-पीता, कमाता सदस्य अगर कोरोना की भेंट चढ़ जाता है, तब सरकार इस महंगाई के दौर में पचास हजार रुपए ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही कही जा सकती है। फिर, कोविड से हुई मौत को प्रमाणित करने के लिए इतनी शर्तें लगा दी गई हैं कि आम आदमी कार्यालयों के चक्कर लगाते-लगाते ही बेदम हो जाएगा। अभी तो मात्र राशि तय हुई है, यह कब मिलेगी पता नहीं। इसलिए इसकी शीघ्र घोषणा की जाए और राशि भी बढ़ाई जानी चाहिए। यह राशि कम से कम दो से चार लाख रुपए हो तो बेहतर है।

भारत सरकार ने पहले भी कोरोना के मरीजों की बढ़ती संख्या देखी है। परिवार के परिवार तबाह हो गए। जब परिवार का मुखिया ही चला गया, तो खाने-पीने की जो परेशानियां इन परिवारों में आर्इं, वह किसी से छिपी बात नहीं है। आज भी काफी संख्या में कोरोना के मरीजों के परिवार बेरोजगार हैं। उनके नौकरी-धंधे का आज भी कुछ जुगाड़ नहीं हो पा रहा है। कोरोना में भारत ने कितना कुछ खोया है, यह हर घर की कहानी है। ऐसे में यही अपेक्षा है कि केंद्र और राज्य सरकारें कोरोना से मौतों में संबंधित परिवार के प्रति सहानुभूति रखें। उनकी हर तरह से मदद करें, यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
’मनमोहन राजावत ‘राज’, शाजापुर

भर्तियों में देरी

वर्तमान में राज्य सरकारें भर्तियों के मामले में दूरी बनाए हुए हैं। भर्तियों को सिर्फ चुनावी वर्ष में एक राजनीतिक एजेंडे के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास करती हैं। इसके चलते छात्रों को नौकरी पाने के लिए काफी लंबा इंतजार करना पड़ता है। इस तरह कई गरीब तबके के लोग, जो कर्ज लेकर तैयारी करते हैं, वे साल दो साल में भर्ती न आने पर हार मान जाते हैं और वे बेरोजगारी का शिकार होते हैं।अगर किसी साल गलती से एक या दो भर्ती आ भी जाए तो राज्य सरकारें आरक्षण का मुद्दा छेड़ देती हैं, जिसमें सुनवाइयां चलती रहती हैं और भर्ती प्रक्रिया में विलंब होता है। सरकार को यह समझना चाहिए कि ये छात्र जो इतनी प्रताड़ना के बाद अंत में नौकरी पाएंगे, तो क्या वे निष्ठा पूर्वक कार्य कर सकेंगे!
’अमन कुमार जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय

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