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चौपालः सभ्य होने के लिए

महिलाओं का सम्मान हमेशा से किसी भी सभ्य समाज के मूल्य और शर्त रहा है। विडंबना यह है कि आज के युवाओं को इन मूल्यों से कोई मतलब नहीं रह गया लगता है।

स्त्रियों को इतने हल्के में लेकर आसानी से उनके खिलाफ अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में जिस प्रकार दिल दहला देने वाले वारदात सामने आए हैं, उन्हें देखकर मन में क्षोभ का भाव जागृत होना स्वाभाविक है। स्त्रियों को इतने हल्के में लेकर आसानी से उनके खिलाफ अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है। इस प्रकार की निकृष्ट घटनाएं न सिर्फ सरकार के रवैये और कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगाती हैं, बल्कि यह समाज के बदलते व्यवहार को भी कठघरे में खड़ा करती हैं। महिलाओं का सम्मान हमेशा से किसी भी सभ्य समाज के मूल्य और शर्त रहा है। विडंबना यह है कि आज के युवाओं को इन मूल्यों से कोई मतलब नहीं रह गया लगता है। निश्चित रूप से यह माता-पिता द्वारा दी जाने वाली शिक्षा में कमी का परिणाम है। स्त्रियों के सम्मान का दावा करने वाला देश अपने युवाओं को सही दिशा दिखाने में असफल साबित हो रहा है।

इस प्रकार के वारदात इसलिए भी बढ़ी है कि सबूत न होने से आरोपी आसानी से छूट जाता है। रसूखदारों के पक्ष में समाज, राजनीतिकों के हस्तक्षेप, पुलिस के रवैये से लेकर न्याय व्यवस्था का लचीलापन काफी हद तक इसका जिम्मेदार है। दरअसल, न्याय पर आधारित व्यवस्था के साथ-साथ प्रौद्योगिकी और नैतिक शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक हो चुकी है। परिवारों में बेटों को सभ्य और इंसानी मूल्यों से लैस किए बिना उनके अपराधी नहीं बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती। महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए भी शुरू से तैयार करने के प्रयास किए जाने की जरूरत है। काफी जगह कराटे आदि की सीख दी जाती है। किसी भी देश की तरक्की तभी संभव है, जब वहां की महिलाएं स्वतंत्र और बिना भय के हर जगह विचरण कर सके। शिक्षा और मौलिक अधिकारों के समझ से इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लगाई जा सकती है।
’संस्कार दुबे, चांपा, छत्तीसगढ़

मौके के साथी
बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरह दूसरे दलों से आए नेताओं को प्रत्याशी बनाया जा रहा है, वह बस नजीर भर है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में धनबल, बाहुबल का महत्त्व तेजी से बढ़ा है। आम कार्यकर्ता जिन्होंने बरसों तक पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाने का काम किया, उनकी उपेक्षा की जाती है। हद तो तब हो जाती है जब ठीक चुनाव के समय नौकरी से जुड़े लोगों को भी पार्टी के टिकट दे दिए जाते हैं। तर्क दिया जाता है कि सामाजिक समीकरण इनके अनुकूल है और यही सीट जीत पाने में सक्षम हैं। चुनाव बाद ऐसे ही लोग दल बदल करते हैं तो हाय-तौबा मचने लगती हैं। विचारधारा का राजनीतिक दलों से अब कोई वास्ता ही नहीं रहा।

इस तरह राजनीतिक अप-संस्कृति जो पनपी है, उसके लिए जिम्मेदार कौन है? मतदाता या राजनीतिक दल? लेकिन जो बातें साफ हैं, उससे लोकतंत्र का भला होने वाला नहीं है, क्योंकि राजनीतिक दल ही लोकतंत्र के वाहक होते हैं। वही स्वस्थ जनमत तैयार करने में मदद करते हैं। चुनाव जीतने के बाद शासन की बागडोर इनके हाथों में होती है। ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि बिना अच्छी राजनीतिक संस्कृति के सुशासन दे पाना क्या संभव है? आखिर इस तरह की दलीय व्यवस्था सुधारने की जिम्मेवारी किसकी है? इस तरह के सवालों के लिए सबसे मुफीद समय चुनाव ही है।
’मुकेश कुमार मनन, पटना, बिहार

 

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