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चौपालः त्योहार का आधार

हमारे देश के कुछ राज्यों मे स्त्री-पुरुष अनुपात कम हुआ है या फिर अभी तक भी कुछ लोगों की निम्न सोच के कारण लड़कों कि अपेक्षा लड़कियों की संख्या कम हो रही है।

Author August 27, 2018 5:12 AM
एक तरफ तो लड़कियों की सुरक्षा प्रदान करने का त्योहार मनाया जाता है तो दूसरी तरफ लड़कियों का ही सुरक्षित न होना बहुत शर्मनाक और निंदनीय है।

त्योहार का आधार

हमारे देश के कुछ राज्यों मे स्त्री-पुरुष अनुपात कम हुआ है या फिर अभी तक भी कुछ लोगों की निम्न सोच के कारण लड़कों कि अपेक्षा लड़कियों की संख्या कम हो रही है। इससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर यही गिरावट जारी रही तो घरों में लड़कियों की खोज मुश्किल होगी और लोग समाज में संतुलन के अलावा रक्षा बंधन जैसे तमाम त्योहारों में जरूरी महिलाओं के बिना ही जीने के लिए मजबूर होंगे। त्योहारों से रिश्तों को मजबूती मिलती है और इंसान में नैतिकता की भावना बढ़ती है। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ ने इन त्योहारों का रंग भी फीका कर दिया है। आज लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वे इन त्योहारों में भाग ले या मना सकें।

आज रिश्तों पर पैसा हावी होने लगा है। रक्षाबंधन बहन-भाई के आपसी प्यार का त्योहार है, जो हमारे देश के कोने-कोने में लगभग हर धर्म के लोगों द्वारा हर्षोल्लास से मनाया जाता है। लेकिन यहां यह बात भी गौर करने वाली है कि जिस देश में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता हो, वहां कन्याभ्रूण हत्या से लेकर महिलाओं के खिलाफ तमाम अपराध क्या इस त्योहार की तौहीन नहीं है? एक तरफ तो लड़कियों की सुरक्षा प्रदान करने का त्योहार मनाया जाता है तो दूसरी तरफ लड़कियों का ही सुरक्षित न होना बहुत शर्मनाक और निंदनीय है।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

किसके लिए

गेट वे ऑफ इंडिया (मुंबई), इंडिया गेट (नई दिल्ली) और बुलंद दरवाजा (फतेहपुर सिकरी) की तर्ज पर स्थापित पटना स्थित ‘सभ्यता द्वार’ बिहार की ऐतिहासिक गौरव गाथा प्रस्तुत करती है। पांच करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस सभ्यता द्वार पर चार महापुरुषों महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, सम्राट अशोक, मेगास्थनीज की वाणी अंकित है। कहते हैं कि इसके निर्माण के लिए राजस्थान से लाल और सफेद पत्थर मंगवाए गए। खूबसुरत बाग पर्यटकों को आकर्षित करती है। इन सब विशिष्टताओं के बीच यह खबर चिंतनीय है कि फिलहाल इसे आम लोगों की पहुंच से दूर केवल वीआइपी लोगों के लिए खोला गया है। दुनिया को लोकतंत्र का संदेश देने वाली बिहार की धरती पर स्थापित ‘सभ्यता द्वार’ कुछ खास लोगों के लिए खोलना, आम जनों के साथ भेदभाव है। इससे वैश्विक स्तर पर बिहार की छवि धूमिल होती है। आशा है लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षार्थ सरकार शीघ्र ही जनहित में इस मसले पर फैसला लेगी और इसे सबके लिए खोला जाएगा।

मंजर आलम, रामपुर डेहरु, मधेपुरा, बिहार

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