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चौपालः रेत के आशियाने

लोग राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ‘एक अदद अपना आशियाना हो जाए’ जैसी उम्मीद में जीवन भर की कमाई लगा कर या गांव का खेत बेच कर या बैंक से कर्ज लेकर एक छोटे ही सही, आशियाने के लिए बिल्डर माफिया की गिरफ्त में फंस कर सपरिवार अपनी जीवन लीला समाप्त करने को अभिशप्त हैं!

Author August 13, 2018 5:13 AM
दिल्ली और उसके आसपास रेत के महल खड़े किए जा रहे हैं।

रेत के आशियाने

दिल्ली और उसके आसपास रेत के महल खड़े किए जा रहे हैं। लोग राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ‘एक अदद अपना आशियाना हो जाए’ जैसी उम्मीद में जीवन भर की कमाई लगा कर या गांव का खेत बेच कर या बैंक से कर्ज लेकर एक छोटे ही सही, आशियाने के लिए बिल्डर माफिया की गिरफ्त में फंस कर सपरिवार अपनी जीवन लीला समाप्त करने को अभिशप्त हैं! इससे लगता है कि भारत की सारी व्यवस्था ही भ्रष्टाचार के बजबजाते कीचड़ में लिपट कर सड़ गई है। शहरों में बहुमंजिला भवन बनाने वाले अधिकतर बिल्डर धूर्त और धोखेबाज होते हैं। इनके अत्यंत घनिष्ठ संबंध नेताओं, शासन-प्रशासन, नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, बैंकों के कर्मचारियों- अधिकारियों से होते हैं। इस आधार पर ये अपने ग्राहकों को यह विश्वास दिलाने में सक्षम होते हैं कि ‘उनका सब कुछ ठीक है’। जबकि उनका ‘बहुत कुछ’ बिल्कुल ठीक नहीं होता; हर जगह रिश्वत, सेटिंग और प्रभाव से हर गलत को जबर्दस्ती सही किया गया होता है। जब तक इस तरह की भ्रष्ट व्यवस्था और बिल्डर माफिया का संबंध सत्ता प्रतिष्ठान और प्रशासनिक निकायों में बना रहेगा, इस सड़ चुकी व्यवस्था में बिल्डरों पर जवाबदेही निर्धारित हो ही नहीं सकती और लोग ऐसे ही इनके जाल में फंसते रहेंगे और मरते रहेंगे।

निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

समान वेतन

बिहार सरकार नियोजित शिक्षकों को समान काम के लिए समान वेतन नहीं देने के लिए लिए तरह-तरह के तर्क दे रही है जिससे इन शिक्षकों का वर्तमान और भविष्य सब कुछ बर्बाद हो रहा है। सरकार का कहना है कि इन्हें शिक्षकों की तरह वेतनमान देने से राज्य की अन्य योजनाएं प्रभावित होंगी या उन्हें बंद करना पड़ेगा। सवाल है कि देश में समानता का अधिकार कब मिलेगा। क्या यह मौलिक अधिकार अप्रासंगिक होता चला जाएगा? एक ही छत के नीचे समान शिक्षा देने वालों के बीच आपसी भेदभाव बढ़ाने का क्या औचित्य है? अगर राज्य के आर्थिक हालात सचमुच खराब हैं तो इसका असर अन्य विभागों में भी दिखता। सभी राजनेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियो के वेतन में कटौती की जाती तो माना जा सकता था कि सचमुच राज्य सरकार की माली हालत खराब है। लेकिन सिर्फ शिक्षकों के नाम पर ऐसा क्यों? दूसरी ओर अन्य कर्मचारियों की भांति ऐसा कोई काम नहीं जो नियोजित शिक्षकों से न कराया जाता हो। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखते हुए नियोजित शिक्षकों को वेतनमान दे देना चाहिए कि इन्हीं की बदौलत बिहार की शिक्षा व्यवस्था टिकी हुई है।

मिथिलेश कुमार, भागलपुर

कूड़े की जगह

रेलवे की एक खबर पढ़ी कि अब से पैंट्री कर्मी यात्रियों को भोजन परोसे जाने के बाद कचरा एक थैले में एकत्रित करेंगे। पहले यात्री खाना खाकर प्लेट सीट के नीचे सरका देते थे या ट्रेन के बाहर कचरा फेंक देते थे। सवाल है कि क्या हमारे देश के लोग कूड़ा-करकट सड़क पर फेंकने में ज्यादा माहिर हैं या हमारी सरकार जनता को ऐसी सुविधाएं देती ही नहीं कि वे कचरे को सही जगह फेंक पाएं! ट्रेन की इतनी लंबी यात्रा में कभी भी कोई व्यक्ति न तो आपके पास कचरा इकट्ठा करने आता है और न ही उसकी कोई व्यवस्था दिखाई देती है। इसलिए ट्रेन पूरे देश में एक चलती-फिरती कूड़ा फैलाने वाली गाड़ी ज्यादा नजर आती है। ऐसी ही हालत बस अड््््डों से लेकर गली-मोहल्लों में दिखाई पड़ती है। कुछ शहरों में तो एक-दो साल पहले ही घरों से कचरा उठाने की शुरुआत हुई है और कहीं वह भी नहीं है। अगर पैसा हो तो कूड़ा फिंकवाओ, वरना सड़क के हवाले कर दो! दिल्ली मेट्रो जैसे आलीशान परिवहन साधन में भी यह ध्यान नहीं रखा गया है। कोर्ट के आदेश के बाद एक छोटा-सा कूड़ेदान कहीं लटका हुआ मिल जाएगा। सरकार को यह मान कर नहीं चलना चाहिए कि आदमी अपना कूड़ा करकट अपने बैग में डाल कर चले। उसे ऐसे स्थान भी उपलब्ध कराने चाहिए कि मजबूरी में कूड़ा सड़क पर डालने के लिए बाध्य न होना पड़े।

मोहन सूर्यवंशी, नई दिल्ली

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