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चौपाल: गरीब और रोटी

भविष्य में आने वाली इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्रदान किए गए जीवन के अधिकार में आने वाले भोजन के अधिकार को ध्यान में रखते हुए तत्काल इन तबकों के लिए मुफ़्त संतुलित आहार की व्यवस्था करे।

Author Published on: March 25, 2020 5:15 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर: दुनिया भर में Coronavirus से लाखों लोग संक्रमित हो चुके हैं।

जानलेवा कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण पूरे भारत में पूर्ण बंद लागू किया जा चुका है। पंजाब, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में कर्फ्यू भी लगा हुआ है। ऐसे में भारत की अधिकांश गरीब जनमानस जो रोजाना मजदूरी करके, रिक्शा चला कर और अन्य माध्यमों से अपनी दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे, वह आज अपने घरों में कैद है। यह भारत का वह तबका है जो रोजाना कुआं खोदता था, तब जाकर प्रत्पिानी मिलता था। लेकिन अब बंदी में इस तबकेके पास आय का कोई साधन नहीं है। इनके जनधन खाते में भी मुश्किल से 500 रुपए होंगे। जो हालात हैं उसमें तो लग रहा है कि इस महामारी से लड़ने के लिए भारत को दो-तीन महीने लग सकते हैं। ऐसे में भारत का यह गरीब तबका कोरोना के बजाय भूख से ही मरने लगेगा, जो बहुत ही दुखद होगा। ऐसे में भारत सरकार से अनुरोध है कि वो इनके लिए एक विशेष आर्थिक पैकेज जारी करे, जिससे कम से कम जनहानि हो सके। भविष्य में आने वाली इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्रदान किए गए जीवन के अधिकार में आने वाले भोजन के अधिकार को ध्यान में रखते हुए तत्काल इन तबकों के लिए मुफ़्त संतुलित आहार की व्यवस्था करे।
’आकाश सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

सबक की जरूरत
कहावत है ‘एक सेहत हजार नियामत’। सेहतमंद इंसान अगर फकीर भी हो तो उसका जैसा धनवान दुनिया में कोई नहीं। देश दुनिया इन दिनों कोविड 19 विषाणु से युद्धरत है। हमेशा के भांति जीत तो इंसानों की ही होगी, भले थोड़ा समय लगे। चीन का हुबेई प्रांत के बाद, इस समय यूरोप इस वायरस का केंद्र बना हुआ है। काश विश्व का उन्नत महाद्वीप, चीन से शिक्षा लेता। शहरों घरों को लॉक डाउन किया होता तो इटली, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन का वैसा हाल नहीं होता जो आज हो रहा है। हालांकि भारत ने इस वायरस का फैलाव रोकने में सफलता पा ली है। इसके लिए सरकार की कड़ी निति और जनता का सहयोग को श्रेय दिया जाना चाहिए। यह वही भारत है जहां 1918 में स्पेनिश फ्लू के कारण एक करोड़ बीस लाख लोग मारे गए थे। 1974 में चेचक महामारी ने पंद्रह हजार लोगों की जान ले ली थी।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी (जमशेदपुर)

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