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चौपाल: कैसे होंगी परीक्षाएं

बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लगभग आधे छात्र दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आकर पढ़ते हैं, जो अक्सर गांव में इंटरनेट के नेटवर्क की समस्या से जूझते हैं। कई के पास स्मार्टफोन लैपटॉप नहीं है। वे कैसे ऑनलाइन पढ़ेंगे।

ऑनलाइन पढ़ते बच्चे।

कुछ दिनों से कई विश्वविद्यालयों द्वारा ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित कराने की खबरें आने लगी हैं। कई सारे छात्र इस वजह से चिंता में पड़ गए, क्योंकि सुदूरवर्ती क्षेत्रों के कई छात्र जब ऑनलाइन कक्षा कर पाने में सक्षम नहीं थे, तो ऑनलाइन परीक्षा में कैसे बैठ पाएंगे। इसी का विरोध करते हुए ट्विटर पर भी कई हैशटैग चले, जहां दिल्ली विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय सहित कई अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र ऑनलाइन परीक्षा का विरोध करते दिखे।

इन तमाम बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लगभग आधे छात्र दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आकर पढ़ते हैं, जो अक्सर कहते हैं कि उनके गांव में ठीक से नेटवर्क नहीं आता, जिससे शिक्षक को ऑनलाइन सुन भी नहीं पाते, तो किसी के पास स्मार्टफोन लैपटॉप नहीं होता, किसी के फोन में इंटरनेट सुविधा नहीं है। तमाम छात्रों की अलग-अलग समस्याएं रहती हैं। जो छात्र-छात्राएं जम्मू-कश्मीर व लद्दाख क्षेत्र से आते हैं, वे कहते हैं कि “इतने लंबे वक्त के बाद जम्मू कश्मीर में इंटरनेट सुविधा तो बहाल हुई है परंतु 4जी के दौर में 2जी की स्पीड दी जा रही है जिससे न तो ऑनलाइन कक्षा में शामिल हो पाना संभव है और न ही ऑनलाइन परीक्षा देना।

इन सभी समस्याओं को नजरअंदाज कर भी लें तो विश्वविद्यालयों के प्रशासन को यह सोचना चाहिए कि जब बच्चों की पूरी कक्षाएं ही नहीं लगीं और पाठ्यक्रम ही पूरा नहीं हुआ तो ऑनलाइन परीक्षा में भी कैसे अपना प्रदर्शन कर पाएंगे।
’जुगल किशोर, चंपावत (उत्तराखंड)

सतर्कता की जरूरत
पूर्णबंदी के चौथे दौर में ज्यादातर राज्य सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर रियायतें दी हैं। लेकिन इन छूटों का लोग गलत फायदा उठा रहे हैं और नियमों का उल्लंघन भी कर रहे हैं। अधिकतर लोग बिना मास्क लगाए बाजार और सड़कों पर घूमते नजर आ रहे हैं। सुरक्षित दूरी का पालन भी नहीं कर रहे हैं। वाहनों पर भी निर्धारित सवारी से अधिक लोग बिना हेलमेट के सड़कों पर निकल पड़े हैं।

भारत दुनिया में सबसे ज्यादा मरीजों के मामले में ग्यारहवें स्थान पर पहुंच चुका है। इसके बावजूद प्रवासी मजदूरों की आवाजाही और लोगों का कोरोना से बिना डरे उन्मुक्त होकर विचरण बंद नहीं हो रहा है। इसका बहुत बड़ा खमियाजा भुगतना पड़ सकता है। हम खुद से नहीं संभलेंगे तो नियमों को लादने से कुछ नहीं होगा।
’अंजली राजपूत, झांसी

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