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चौपाल: युवाओं का भविष्य

युवा चिड़िया की उस नन्हे-से बच्चे की तरह है, जो अभी अपने अपने अंडे को तोड़ कर बाहर निकाला है और अपने छोटे-छोटे पंखों को फैला कर उम्मीद और आजादी की खुली आकाश में उड़ने को बेकरार है।

भारत में कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोगों की नौकरियां गई हैं। (एक्सप्रेस फोटो)

मौजूदा दौर में चल रही महामारी ने कुछ ऐसे जख्म दिए हैं, जिसकी भरपाई करना निकट भविष्य में मुश्किल है। यह एक ऐसा वक्त है, जिसमें न परीक्षा है और न नौकरी का ठिकाना है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन में युवाओं की संख्या जहां कुल आबादी की बाईस फीसद से अधिक होगी और जापान में यह करीब बीस फीसद होगी, वहीं भारत में यह आंकड़ा सबसे अधिक बत्तीस फीसद होगी। यानी भारत अपने सुनहरे दौर के करीब है, जहां भारत की अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों को छू सकती है। लेकिन जब हम युवाओं के सहारे देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की बात करते हैं तो इस बात को समझना आवश्यक होगा कि युवा होना केवल जिंदगी में जवानी का दौर नहीं होता, जिसे आंकड़ों में शामिल करके गर्व किया जाए।

कहा जा सकता है कि युवा चिड़िया की उस नन्हे-से बच्चे की तरह है, जो अभी अपने अपने अंडे को तोड़ कर बाहर निकाला है और अपने छोटे-छोटे पंखों को फैला कर उम्मीद और आजादी की खुली आकाश में उड़ने को बेकरार है। जब हमें ये बात करते हैं कि हमारे युवा देश को बदल सकते हैं तो क्या हम यह भी सोचते हैं कि वे कौन-से युवा हैं, जो देश को बदलेगा?

वे युवा स्वरोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं? या वे युवा जिसकी प्रतिभा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है? या वे युवा जो देश में अपनी प्रतिभा को उचित सम्मान न मिलने पर विदेशी कंपनियों में नौकरी कर देश छोड़ कर चले जाने के लिए विवश है? या फिर वे युवा जिसके हाथों में डिग्रियां तो हैं, लेकिन विषय से संबंधित व्यावहारिक ज्ञान का सर्वथा अभाव है? या फिर वे साक्षर तो हैं, लेकिन शिक्षित नहीं? या वे युवा जो कभी तीन माह की तो कभी तीन साल की बच्ची तो कभी निर्भया के बलात्कार में लिप्त हैं? या वे युवा जो आज इंटरनेट और सोशल मीडिया वेबसाइटों की गिरफ्त में है? या फिर वे युवा जो कॉलेज परिसर के किसी राजनीतिक दल के हाथों का मोहरा भर है? तो फिर कौन-से युवा देश बदलेगा?

दरअसल, अगर हम चाहते हैं कि युवा इस देश को बदले तो सबसे पहले हमें खुद को बदलना होगा। हमें उन्हें सही मायने में शिक्षित करना होगा। उनका ज्ञान जो किताबों की अक्षरों तक सीमित है, उसे व्यावहारिक ज्ञान की सीमाओं तक लाना होगा। जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है, पूर्णबंदी में क्रमश: धीरे-धीरे राहत के साथ सार्वजनिक गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। इसके बीच युवा अपने भविष्य के लिए चिंतित हैं। वास्तविकता यह है कि उनके भविष्य के रास्ते अभी नहीं खुले हैं। नई भर्तियां निकलने का काम सुस्त है।

वहीं अलग-अलग परीक्षा में चयनित अभ्यर्थी नियुक्ति के लिए अधिकारियों का चक्कर काट रहे हैं। उनका भविष्य अधर में फंसता जा रहा है। इधर कोरोना के कारण हुए पूर्णबंदी से सारी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो गई हैं। कोरोना वायरस ने देश के भविष्य यानी युवाओं के कॅरियर और उनके सपनों को भी बंद कर दिया है। हर नौजवान का सपना पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने का होता है। लेकिन कोरोना काल में सब ध्वस्त कर दिया है। पहले एम-टेक और गेट क्वालिफाई विद्यार्थियों को कंपनियों में प्रस्ताव मिलते थे। लेकिन अभी सब कुछ बंद है और इसके साथ ही युवाओं का भविष्य भी अधर में है।
’रूबी सिंह, गोरखपुर, उप्र

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